कल्पना कीजिए, आपने साल भर में कोई प्रॉपर्टी खरीदी, म्यूचुअल फंड में पैसा लगाया, या बैंक से तगड़ा ब्याज कमाया—और आपको लगा कि 'चलो, इसे फाइलिंग में नहीं दिखाते, कौन सा विभाग को पता चलेगा?'
यहीं आप सबसे बड़ी गलती कर बैठते हैं। आज का आयकर विभाग पूरी तरह से 'डेटा-ड्रिवन' है। आपके पैन (PAN) नंबर से लिंक होते ही, दुनिया का हर वित्तीय लेनदेन विभाग के पास 'अलर्ट' की तरह पहुंच जाता है। यदि आपके आईटीआर का डेटा विभाग के सिस्टम से मैच नहीं हुआ, तो समझ लीजिए कि 'कारण बताओ नोटिस' का खत आपके नाम छप चुका है।
इस 'डिजिटल जासूसी' से बचने के लिए, आपको तीन ऐसी फाइलों को डिकोड करना होगा, जो आपकी वित्तीय साख तय करती हैं:
1. एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS): आपकी 'फाइनेंशियल डायरी'
AIS को आप अपनी उस डायरी की तरह समझिए, जिसमें आपकी हर गतिविधि दर्ज है। इसमें आपके बैंक का ब्याज, डिविडेंड, शेयर बाजार का प्रॉफिट और प्रॉपर्टी की खरीद-बिक्री सब कुछ है। यह एक ऐसा आईना है जिसमें विभाग को आपकी पूरी कमाई दिखती है। अगर इस डायरी में कोई आय दर्ज है और आपने उसे आईटीआर में गायब कर दिया, तो विभाग का सिस्टम उसी पल आपके रिटर्न को 'फ्लैग' कर देगा।
2. फॉर्म 26AS: आपकी 'टैक्स पासबुक'
क्या आपने कभी सोचा है कि जो टैक्स आपके नियोक्ता (Employer) ने काटा, वो कहाँ जाता है? यह फॉर्म 26AS में जमा होता है। इसे आप अपनी 'टैक्स पासबुक' कह सकते हैं। अगर आप आईटीआर में टीडीएस क्लेम कर रहे हैं, लेकिन यह आपकी पासबुक से मेल नहीं खाता, तो आपका रिफंड अटकना निश्चित है। यह उन पैसों का हिसाब है जो सरकार ने आपसे पहले ही ले लिए हैं।
3. टैक्सपेयर इंफॉर्मेशन समरी (TIS): अंतिम 'स्कोरकार्ड'
यह सबसे दिलचस्प दस्तावेज है। TIS, AIS का ही एक संक्षिप्त और प्रोसेस किया हुआ वर्जन है। विभाग का सिस्टम ढेर सारी जानकारी को छानकर एक 'फाइनल टैक्सेबल वैल्यू' निकालता है, जिसे TIS कहा जाता है। यह विभाग का वो 'स्कोरकार्ड' है, जिसके आधार पर वे तय करते हैं कि आपने सही टैक्स भरा है या नहीं।
तो फिर बचाव कैसे करें?
टैक्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि आईटीआर भरने से पहले 'जासूस' खुद बनें। पोर्टल पर लॉग इन करें और इन तीनों स्टेटमेंट्स को डाउनलोड करें। इन्हें अपने बैंक स्टेटमेंट और निवेश के दस्तावेजों से मिलाएं। जिस तरह एक जासूस किसी भी छोटी सी कड़ी को नजरअंदाज नहीं करता, उसी तरह आप भी किसी एंट्री को न छोड़ें।
याद रखिए, आईटीआर फाइलिंग में 'जल्दबाजी' और 'अज्ञानता' ही नोटिस का सबसे बड़ा कारण बनती है।


