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जब कृषि कानून वापस हो सकते हैं, तो TET अनिवार्यता क्यों नहीं: NMOPS

Sir Ji Ki Pathshala

नई दिल्ली / लखनऊ: राष्ट्रीय स्तर पर पुरानी पेंशन बहाली की अलख जगाने वाले संगठन नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम (NMOPS) ने अब शिक्षकों के हितों को लेकर एक बड़ा मोर्चा खोल दिया है। कृषि कानूनों की वापसी का ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए संगठन ने केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2017 में शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम में किए गए संशोधन को तत्काल रद्द करने की मांग की है।

विजय कुमार बंधु एनएमओपीएस शिक्षक आंदोलन टीईटी अनिवार्यता विरोध

​एनएमओपीएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय कुमार बंधु ने सोशल मीडिया (फेसबुक लाइव) के माध्यम से देशभर के लाखों शिक्षकों को संबोधित किया। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि अगर जनभावनाओं और विरोध के आगे सरकार तीन कृषि बिल वापस ले सकती है, तो वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के भविष्य को संकट में डालने वाला 2017 का संशोधन क्यों नहीं रद्द किया जा सकता?

​25 साल की सेवा के बाद योग्यता का पैमाना क्यों? 'फैसला' है 'न्याय' नहीं!

​विजय कुमार बंधु ने हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "अदालत द्वारा दिया गया आदेश महज एक कानूनी फैसला है, उसे न्याय नहीं कहा जा सकता।" उन्होंने 2017 के संशोधन की विसंगतियों को उजागर करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु उठाए:

  • भ्रामक संशोधन: 2017 में जब केंद्र सरकार द्वारा संशोधन लाया गया, तो उसमें केवल 'न्यूनतम योग्यता' (Minimum Qualification) की बात कही गई थी।
  • नियमों का गलत क्रियान्वयन: उस संशोधन में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि 25 वर्ष पहले नियुक्त हो चुके और दशकों से अपनी सेवाएं दे रहे शिक्षकों पर भी टीईटी (TET - Teacher Eligibility Test) लागू होगा।
  • भविष्य पर संकट: सरकार इस संशोधन की आड़ में देशभर के वरिष्ठ शिक्षकों के साथ छल कर रही है और एक सोची-समझी रणनीति के तहत उनकी नौकरी को खतरे में डाला जा रहा है।

​"अगर शिक्षक अयोग्य हैं, तो उनके पढ़ाए डॉक्टर, नेता और अधिकारी भी अयोग्य हुए"

​शिक्षकों के पक्ष में पुरजोर वकालत करते हुए विजय कुमार बंधु ने सरकार की नीतियों पर तीखे तंज कसे। उन्होंने कुछ बेहद व्यावहारिक और तार्किक उदाहरण सामने रखे:

तर्क नंबर 1: पुरानी शादियों का उदाहरण

"वर्षों पहले देश में कई शादियां 15 या 16 वर्ष की उम्र में हुई थीं, जो आज के कानून के मुताबिक नाबालिग की श्रेणी में आती हैं। तो क्या सरकार उन सभी शादियों को अवैध घोषित कर देगी? क्या उनसे पैदा हुए बच्चे अयोग्य हो जाएंगे?"  

तर्क नंबर 2: पढ़ाए गए छात्रों का मुकाम

"जिन शिक्षकों ने पिछले 25 वर्षों में देश को सांसद, विधायक, आईएएस-आईपीएस अधिकारी और डॉक्टर दिए, आज उन्हें अयोग्य ठहराया जा रहा है। अगर शिक्षक अयोग्य हैं, तो उनके द्वारा तैयार की गई देश की यह पूरी व्यवस्था भी अयोग्य मान ली जानी चाहिए।"

​निजीकरण और शिक्षामित्रों के हश्र से सबक लेने की चेतावनी

​एनएमओपीएस के अध्यक्ष ने शिक्षकों को आगाह करते हुए देश में हाल के वर्षों में घटी कुछ बड़ी घटनाओं की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि जो शिक्षक आज खुद को सुरक्षित समझ रहे हैं, वे बड़ी गलतफहमी में हैं। सरकार की नीतियां क्रमिक रूप से सबको अपनी जद में ले रही हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो हाल:

  1. शिक्षामित्रों का हुआ,
  2. डायल 100 की महिला ऑपरेटरों के साथ हुआ,
  3. ​और बीएसएनएल (BSNL)एयर इंडिया के कर्मचारियों के साथ हुआ...

​वही हश्र आने वाले समय में नियमित शिक्षकों का भी हो सकता है। आज जो शिक्षक टीईटी की अनिवार्यता के दायरे से बाहर हैं, कल को उनके लिए भी कोई नया कानून बनाकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

​आत्मकेन्द्री नेतृत्व का बहिष्कार और 'सड़क पर संघर्ष' का आह्वान

​लेख के अंत में, विजय कुमार बंधु ने देश के शिक्षक संगठनों के भीतर चल रही खींचतान और गुटबाजी पर भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने शिक्षकों से अपील की:

  • अहंकारी नेतृत्व का बहिष्कार: यदि आपका मौजूदा नेतृत्व आज भी अलगाव के रास्ते पर चल रहा है और आत्मकेन्द्री या अहंकेन्द्री दृष्टिकोण रखता है, तो समय आ गया है कि ऐसे संगठनों को छोड़ दिया जाए।
  • एकजुटता की जरूरत: शिक्षकों को अब घर बैठे रहने के बजाय अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।
  • आर-पार की लड़ाई: एनएमओपीएस ने देशभर के शिक्षकों का आह्वान किया है कि वे सरकार की इस 'साजिश' को समझें और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने के लिए तैयार रहें।

निष्कर्ष:

एनएमओपीएस के इस रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में पुरानी पेंशन बहाली के मुद्दे के साथ-साथ शिक्षकों की सेवा सुरक्षा और टीईटी अनिवार्यता का यह विवाद एक बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इस असंतोष को कैसे संभालती है।