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शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य; टीईटी परीक्षा साल में दो बार न कराने पर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को लगाई फटकार

Sir Ji Ki Pathshala

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य; 5 लाख से अधिक गुरुजी संकट में, साल में दो बार परीक्षा न कराने पर आयोग को फटकार

लखनऊ: देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने शिक्षकों की योग्यता और पात्रता को लेकर एक बेहद सख्त और दूरगामी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में साफ कर दिया है कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए शिक्षक अर्हता परीक्षा (TET) पास करना पूरी तरह अनिवार्य होगा। इस फैसले ने जहां एक तरफ उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश के लाखों कार्यरत शिक्षकों की धड़कनें बढ़ा दी हैं, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को भी कड़े कटघरे में खड़ा कर दिया है।

Supreme Court decision on compulsory TET for UP teachers

​सुप्रीम कोर्ट ने नियमों का हवाला देते हुए परीक्षा नियामक प्राधिकारी और सरकार से तीखा सवाल किया है—"जब अध्यापन के लिए TET को अनिवार्य शर्त बनाया गया है, तो परीक्षा नियामक आयोग साल में दो बार इस परीक्षा का आयोजन क्यों नहीं करा सकता?"

​आयोग की सुस्ती पर भड़का कोर्ट, 4 साल से ठप है परीक्षा

​सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख उत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा तंत्र की बदहाली को उजागर करता है। रिकॉर्ड्स बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में आखिरी बार साल 2021 में TET के लिए आवेदन मांगे गए थे। वह परीक्षा भी पेपर लीक की भेंट चढ़ गई, जिसे जैसे-तैसे साल 2022 की शुरुआत में आयोजित कराया जा सका।

​विगत 4 वर्षों से उत्तर प्रदेश में एक बार भी TET की परीक्षा का सफल आयोजन नहीं हो पाया है। हालांकि, चौतरफा दबाव के बाद अब आगामी 2 से 4 जुलाई के बीच इस परीक्षा को कराने का एक प्रस्ताव तैयार किया गया है।

​कोर्ट के इस फैसले पर प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने सरकार को घेरते हुए कहा: ​"नियम तो हमेशा से ही साल में दो बार परीक्षा कराने का था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ याद दिलाया है। अगर कोर्ट के कड़े नियम और शर्तें केवल शिक्षकों पर थोपी जाएंगी, तो वही नियम सरकार और शिक्षा सेवा चयन आयोग पर भी समान रूप से लागू होने चाहिए। परीक्षा समय पर न करा पाना आयोग की नाकामी है।"

​अकेले यूपी में 5 लाख से अधिक शिक्षकों की नौकरी पर आंच

​NCTE (नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन) की गाइडलाइन का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब नए और पुराने—सभी कार्यरत शिक्षकों के लिए TET को अनिवार्य श्रेणी में डाल दिया है। इस फैसले की सबसे गाज उन वरिष्ठ शिक्षकों पर गिरने वाली है, जिनकी नियुक्ति साल 2011 में TET नियम लागू होने से पहले हुई थी और जो वर्तमान में पदोन्नत (Promote) होकर जूनियर हाईस्कूलों में पढ़ा रहे हैं।

  • बेसिक शिक्षा परिषद: यूपी के परिषदीय स्कूलों के लगभग पौने दो लाख (1.75 लाख) शिक्षक इस फैसले से सीधे प्रभावित हो रहे हैं।
  • निजी व सहायता प्राप्त स्कूल: यदि राजकीय, सहायता प्राप्त (एडेड) और प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के आंकड़ों को भी जोड़ लिया जाए, तो संकट का सामना कर रहे शिक्षकों की कुल संख्या 5 लाख के पार पहुंच जाती है।

राहत की एकमात्र किरण: कोर्ट ने शिक्षकों को पूरी तरह सेवा से बाहर करने के बजाय थोड़ी राहत जरूर दी है। परीक्षा पास करने के लिए समय सीमा (डेडलाइन) को एक साल के लिए आगे बढ़ा दिया गया है, लेकिन किसी भी शिक्षक को परीक्षा देने से छूट देने से साफ इनकार कर दिया है।

​'सड़क से संसद तक' आर-पार की लड़ाई के मूड में शिक्षक संगठन

​सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से पूरे शिक्षक समाज में भारी आक्रोश और असंतोष का माहौल है। शिक्षकों का तर्क है कि जब उनका चयन हुआ था, तब वे तत्कालीन सभी कानूनी प्रक्रिया और योग्यताओं को पूरा करते थे। नौकरी के बीच में या रिटायरमेंट के करीब आकर उन पर ऐसी नई शर्तें थोपना उनके सेवा अधिकारों का हनन है।

​शिक्षक संगठनों ने अब इस कानूनी लड़ाई को सड़क से लेकर संसद तक ले जाने का खुला एलान कर दिया है। 'टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया' के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिनेश चंद्र शर्मा ने कड़े शब्दों में कहा: ​"शिक्षक इस फैसले के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। हमारी नियुक्ति के समय यह नियम वजूद में नहीं था। संगठन इस मामले में देश के बड़े कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रहा है और हम बहुत जल्द इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटिशन (Curative Petition) दायर करेंगे।"

​अब देखना यह होगा कि जुलाई में प्रस्तावित TET परीक्षा को आयोग कितनी शुचिता और समयबद्धता के साथ करा पाता है, और दूसरी तरफ कानूनी मोर्चे पर लाखों शिक्षकों का यह आंदोलन क्या मोड़ लेता है।