लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जूनियर इंजीनियर (जेई) भर्ती को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि जूनियर इंजीनियर के पदों पर केवल डिप्लोमाधारक अभ्यर्थियों का ही कानूनी दावा बनता है। कोर्ट ने इस पद के लिए ग्रेजुएट इंजीनियरों (बी.टेक/बी.ई. डिग्रीधारकों) के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उत्तर प्रदेश के लाखों डिप्लोमा धारक युवाओं में खुशी की लहर दौड़ गई है, जबकि उच्च शैक्षणिक योग्यता वाले डिग्रीधारक अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद उत्तर प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में जूनियर इंजीनियर (जेई) के 4,612 पदों पर निकली भर्ती के विज्ञापन से शुरू हुआ था। इस भर्ती विज्ञापन में उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) ने केवल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा रखने वाले अभ्यर्थियों को ही आवेदन के लिए पात्र माना था।
इस नियम के खिलाफ ग्रेजुएट इंजीनियर्स स्टूडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने मोर्चा खोल दिया था। डिग्रीधारक अभ्यर्थियों का तर्क था कि चूंकि बी.टेक/बी.ई. उच्च शैक्षणिक योग्यता है, इसलिए उन्हें तकनीकी रूप से जूनियर इंजीनियर पद के लिए योग्य माना जाना चाहिए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने पहले ही डिग्रीधारकों की इस दलील को खारिज करते हुए डिप्लोमाधारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके बाद डिग्रीधारक एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में 'विशेष अनुमति याचिका' (SLP) दायर कर हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता से सुनवाई करते हुए ग्रेजुएट इंजीनियर्स एसोसिएशन की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर पद की अपनी एक विशिष्ट आवश्यकता और शैक्षणिक योग्यता होती है। जूनियर इंजीनियर का पद विशेष रूप से डिप्लोमा स्तर की तकनीकी शिक्षा और फील्ड वर्क के अनुभव को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
अदालत ने लखनऊ हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि उच्च योग्यता होना स्वतः ही किसी को उस पद के योग्य नहीं बना देता, जिसके लिए न्यूनतम और विशिष्ट योग्यता डिप्लोमा तय की गई है।
डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ ने जताया हर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का यूपी डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ ने पुरजोर स्वागत किया है। डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ (पीडब्ल्यूडी) के प्रांतीय अध्यक्ष एनडी द्विवेदी ने फैसले पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा: "यह न्याय और नियमों की जीत है। विज्ञापन में स्पष्ट रूप से डिप्लोमाधारी अभ्यर्थियों को ही पात्र माना गया था। अगर उच्च डिग्रीधारकों को इसमें शामिल किया जाता, तो डिप्लोमा करने वाले उन लाखों मध्यमवर्गीय और ग्रामीण युवाओं का हक मारा जाता जिनके पास बी.टेक करने के संसाधन नहीं होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब 4,612 पदों पर भर्ती का रास्ता साफ हो गया है।"
फैसले के दूरगामी परिणाम
इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब उत्तर प्रदेश में जूनियर इंजीनियर भर्ती प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार का कानूनी गतिरोध नहीं रहेगा। उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) अब बिना किसी कानूनी अड़चन के इन 4,612 पदों पर भर्ती प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भविष्य में होने वाली अन्य राज्यों की जेई भर्तियों के लिए भी एक स्पष्ट नजीर (मिसाल) स्थापित हो गई है।


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