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हाईस्कूल पास न होने पर सर्विस बुक में दर्ज तारीख ही होगी अंतिम मान्य - इलाहाबाद हाईकोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

सरकारी सेवा में जन्मतिथि विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हाईस्कूल पास न होने पर सर्विस बुक में दर्ज तारीख ही होगी अंतिम मान्य

प्रयागराज। सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति और जन्मतिथि में बदलाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। माननीय न्यायालय ने साफ कहा है कि यदि कोई कर्मचारी सरकारी सेवा में शामिल होते समय हाईस्कूल या उसके समकक्ष योग्यता नहीं रखता था, तो उसकी सेवा पुस्तिका (Service Book) में मूल रूप से दर्ज जन्मतिथि ही सभी उद्देश्यों के लिए पूरी तरह से मान्य और अंतिम मानी जाएगी।

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​न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि एक बार सेवा पुस्तिका में जो जन्मतिथि दर्ज हो गई, उसमें बाद में किसी भी प्रकार का एकतरफा बदलाव कानूनन स्वीकार्य नहीं होगा।

​यह मामला अलीगढ़ स्थित हरदुआगंज थर्मल पावर प्लांट में कार्यरत एक श्रमिक से जुड़ा हुआ है।

  • नियुक्ति और मूल जन्मतिथि: संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति वर्ष 1988 में हुई थी। सेवा में प्रवेश के समय हुए मेडिकल परीक्षण (Medical Examination) के आधार पर उसकी जन्मतिथि 19 अक्टूबर 1967 दर्ज की गई थी। इस तिथि के अनुसार कर्मचारी को 31 अक्टूबर 2027 को सेवानिवृत्त (Retire) होना था।
  • विभाग द्वारा किया गया बदलाव: बाद में, विभाग ने एक आंतरिक जांच और एक 'ट्रांसफर सर्टिफिकेट' (TC) का हवाला देते हुए कर्मचारी की जन्मतिथि को बदलकर 14 अप्रैल 1966 कर दिया। इस मनमाने बदलाव के कारण उसकी सेवानिवृत्ति की तिथि घटकर 30 अप्रैल 2026 हो गई, जिससे उसकी सेवा के लगभग डेढ़ साल कम हो रहे थे।
  • अभिलेखों में हेरफेर: जांच में यह भी सामने आया कि सर्विस बुक में साल 1966 की जन्मतिथि दर्ज करने के लिए सफेद स्याही (White Ink/Whitener) का इस्तेमाल किया गया था।

​हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और कानूनी आधार

​मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया और विभाग के आदेशों को पूरी तरह से रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रेखांकित किए:

​1. उत्तर प्रदेश भर्ती सेवा नियमावली, 1974 का हवाला

​न्यायालय ने उत्तर प्रदेश भर्ती सेवा (जन्मतिथि निर्धारण) नियमावली, 1974 के नियम 2 का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया। इस नियम के तहत:

  • ​यदि कोई कर्मचारी गैर-हाईस्कूल (Non-Matriculate) है, तो नियुक्ति के समय सक्षम प्राधिकारी द्वारा सेवा पुस्तिका में दर्ज की गई जन्मतिथि ही अंतिम सत्य मानी जाएगी।
  • ​भविष्य में किसी भी अन्य दस्तावेज के आधार पर इसमें ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता जो कर्मचारी के हितों को प्रभावित करता हो।

​2. ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) मान्य दस्तावेज नहीं

​कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि विभाग ने जन्मतिथि बदलने के लिए जिस ट्रांसफर सर्टिफिकेट पर भरोसा किया, वह स्थापित नियमों के तहत जन्मतिथि निर्धारण के लिए एक मान्य कानूनी दस्तावेज नहीं था। बिना ठोस और वैधानिक आधार के सर्विस बुक के मूल रिकॉर्ड से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।

​3. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन

​हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कर्मचारी को बिना सुने और उसकी जानकारी के बिना जन्मतिथि और सेवानिवृत्ति की तारीख बदलने का एकतरफा निर्णय लिया गया। यह पूरी तरह से 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत' (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन है। किसी भी कर्मचारी को बिना पक्ष रखने का अवसर दिए उसकी सेवा अवधि कम नहीं की जा सकती।

​निष्कर्ष: मूल रूप से दर्ज तिथि ही रहेगी प्रभावी

​अदालत ने सर्विस बुक में व्हाइटनर लगाकर की गई ओवरराइटिंग को अनुचित माना और विभाग द्वारा सेवानिवृत्ति की तिथि बदलने संबंधी सभी आदेशों को खारिज (रद्द) कर दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब कर्मचारी अपनी मूल जन्मतिथि (19 अक्टूबर 1967) के आधार पर ही 31 अक्टूबर 2027 तक सेवा में बना रहेगा।

​यह फैसला उन हजारों सरकारी और अर्ध-सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत है, जो कम पढ़े-लिखे होने के कारण सेवा के अंतिम वर्षों में जन्मतिथि के तकनीकी विवादों और विभागीय विसंगतियों का शिकार हो जाते हैं।