प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक बनने की योग्यता को लेकर चल रहा विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन हालिया न्यायिक और सरकारी निर्णयों ने इसे एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ 'तर्क' और 'तथ्य' के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। बुनियादी हकीकत यह है कि बीएड (B.Ed.) कभी भी प्राथमिक स्कूलों के लिए सीधे तौर पर बना ही नहीं था। इसके लिए हमेशा से एक विशिष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता रही है—चाहे आप उसे विशिष्ट बीटीसी कहें, डी.एल.एड. कहें या ब्रिज कोर्स। नाम बदलते रहे, लेकिन उद्देश्य वही रहा: प्राथमिक स्तर के बच्चों को पढ़ाने की विशेष कला।
बीटीसी बनाम बीएड: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
हकीकत तो यह है कि RTE (Right to Education) आने के बाद यह स्पष्ट था कि प्राथमिक शिक्षा का अधिकार बीटीसी धारकों का है। बीएड अभ्यर्थियों को केवल विशेष परिस्थितियों में, राज्य सरकारों की मांग पर और केंद्र की विशेष छूट के तहत मौका दिया जाता था। 72,825 शिक्षक भर्ती से लेकर 69,000 भर्ती तक का सफर इसी 'स्पेशल परमिशन' की कहानी कहता है। अन्यथा, बीच की समस्त भर्तियाँ केवल और केवल डी.एल.एड. (बीटीसी) के नाम ही रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और 'फॉल्स एक्सरसाइज' का संकट
माननीय सर्वोच्च न्यायालय का हालिया रुख और केंद्र सरकार की इस पर मौन सहमति कई सवाल खड़े करती है। जब महान्यायवादी स्वयं रिट्रोस्पेक्टिव (पिछली तारीख से) तरीके से TET की अनिवार्यता पर मुहर लगाते हैं, तो प्रश्न उठता है कि यदि उस समय टीईटी में बैठने के नियम ही स्पष्ट नहीं थे, तो यह प्रक्रिया क्या थी?
यदि भविष्य में इन नियमों को दरकिनार किया जाता है, तो केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा आयोजित कराई जाने वाली टीईटी की परीक्षा महज एक 'False Exercise' (व्यर्थ का अभ्यास) बनकर रह जाएगी। अगर एनसीटीई (NCTE) ही न्यूनतम अर्हता और पाठ्यक्रम का सर्वोच्च मानक है, तो उसके दिशा-निर्देशों के बिना किसी भी नियुक्ति की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
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CTET की वैधता और बदलती परिस्थितियां
वर्तमान विमर्श के केंद्र में 01/09/2025 का निर्णय है। यह स्पष्ट करता है कि चाहे शिक्षक की नियुक्ति बीएड के माध्यम से हुई हो या बीटीसी के माध्यम से, यदि उसने टीईटी (विशेषकर CTET, जिसकी महत्ता अधिक है) उत्तीर्ण कर ली है, तो उसकी पात्रता पर संशय का कोई आधार नहीं होना चाहिए। अब यह सरकारों का दायित्व है कि वे इस कानूनी गुत्थी को सुलझाएं।
"विरोध दिखना चाहिए, लेकिन वह आज नदारद है। बेसिक शिक्षा विभाग अब एक ऐसी पोटली बनने जा रहा है जिसमें समायोजन और मर्जर के नाम पर न जाने क्या-क्या सिमट जाएगा।"
भविष्य की धुंधली तस्वीर
व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आने वाले दस वर्षों में प्राथमिक शिक्षा का ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा। एक समय था जब न्यायिक विसंगतियों के खिलाफ डटकर खड़ा हुआ जाता था, लेकिन आज परिस्थितियां और दबाव अलग हैं। जो लोग आज CTET की वैधता पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना एक प्रोफेशनल मानक है जिसे चुनौती देना पूरे सिस्टम को चुनौती देने जैसा है।
निष्कर्ष:
परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, CTET पूरी तरह वैध है और रहेगा। हमने भी पहले बीएड किया, फिर टीईटी दी और फिर विशिष्ट बीटीसी के दौर से गुजरे। यदि कोई इस संघर्ष और इस योग्यता को चुनौती देना चाहता है, तो वह पूरे तंत्र को चुनौती दे रहा है। न्याय और सरकार से उम्मीदें अपनी जगह हैं, लेकिन धरातल की लड़ाई अपनी जगह।
#हिमांशु राणा के मूल पोस्ट के आधार पर


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