देव (औरंगाबाद) | बिहार: शिक्षा के गिरते स्तर और क्लासरूम में शिक्षकों की लापरवाही को लेकर पड़ोसी राज्य बिहार के औरंगाबाद जिले से एक बड़ी खबर सामने आई है। औरंगाबाद के देव प्रखंड में अब सरकारी शिक्षकों के लिए स्कूल परिसर में मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना महंगा पड़ सकता है। प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (BEO) ने एक नया और कड़ा आदेश जारी किया है, जिसका उल्लंघन करने पर सीधे विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
क्या है नया आदेश? (BEO देव का सख्त रुख)
प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, देव द्वारा जारी पत्रांक 226 (दिनांक 04/04/26) के अनुसार, अब स्कूलों में पठन-पाठन की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों पर डिजिटल पाबंदी लगा दी गई है। आदेश के मुताबिक, अब किसी भी शिक्षक को कक्षा संचालन के दौरान अपने पास मोबाइल फोन रखने की अनुमति नहीं होगी।
आदेश की मुख्य बातें:
- फोन जमा करना अनिवार्य: स्कूल पहुँचते ही और क्लास शुरू होने से पहले सभी शिक्षकों को अपना मोबाइल फोन प्रधानाध्यापक (Headmaster) कक्ष में जमा करना होगा।
- छुट्टी के बाद ही मिलेगा फोन: शिक्षक अपना फोन केवल स्कूल की अवधि समाप्त होने या छुट्टी होने के बाद ही वापस ले सकेंगे।
- निरीक्षण और दंड: यदि कोई शिक्षक क्लास में मोबाइल का उपयोग करते हुए पाया गया, तो संबंधित शिक्षक के साथ-साथ प्रधानाध्यापक के खिलाफ भी वरीय पदाधिकारियों को कड़ी कार्रवाई की रिपोर्ट भेजी जाएगी।
क्यों लिया गया यह कड़ा फैसला?
अक्सर यह शिकायतें मिल रही थीं कि कई शिक्षक क्लासरूम में बच्चों को पढ़ाने के बजाय फोन पर लंबी बातचीत, सोशल मीडिया या अन्य मनोरंजन की गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। जिला शिक्षा पदाधिकारी, औरंगाबाद की बैठक में यह मुद्दा गंभीरता से उठा था।
विभाग का मानना है कि:
- मोबाइल के उपयोग से शिक्षकों की एकाग्रता भंग होती है।
- बच्चों की पढ़ाई का कीमती समय बर्बाद होता है।
- विद्यालय के शैक्षणिक वातावरण में गिरावट आती है और छात्रों के भविष्य पर बुरा असर पड़ता है।
किन पर लागू होगा यह नियम?
यह नया फरमान देव प्रखंड के अंतर्गत आने वाले सभी:
- प्रभारी प्रधानाध्यापकों
- प्रधानाध्यापकों
- प्रधान शिक्षकों
- और सहायक शिक्षकों पर समान रूप से लागू होगा।
क्या बदलेगी शिक्षा की तस्वीर?
बिहार के औरंगाबाद में लिया गया यह फैसला एक मिसाल बन सकता है। शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता न करने की प्रखंड प्रशासन की यह पहल सराहनीय है। हालांकि, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस 'डिजिटल पाबंदी' का असर छात्रों के परीक्षा परिणामों और स्कूलों के अनुशासन पर कितना पड़ता है।


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