लखनऊ। उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में एक बार फिर प्रशासनिक अस्थिरता का दौर लौट आया है। प्रदेश की नौनिहालों के भविष्य और बुनियादी शिक्षा की रूपरेखा तय करने वाला यह महकमा इस समय 'स्थायी कप्तानों' के भारी अकाल से जूझ रहा है। स्थिति यह है कि विभाग के सबसे महत्वपूर्ण अंगों—बेसिक और माध्यमिक शिक्षा—सहित शीर्ष चारों बड़े पद पूरी तरह से कार्यवाहक और प्रभारी अधिकारियों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।
डॉ. महेंद्र देव के रिटायर होते ही टूटा 'पूर्णकालिक' नेतृत्व का सिलसिला
विभाग में तकनीकी रूप से एकमात्र पूर्णकालिक और स्थायी निदेशक के रूप में कार्यरत डॉ. महेन्द्र देव बीते 31 मई को सेवानिवृत्त (रिटायर) हो गए। उनके जाते ही शिक्षा विभाग से स्थायी कमान का दौर भी फिलहाल के लिए खत्म हो गया है। शासन को आनन-फानन में नई नियुक्तियों के आदेश तो जारी करने पड़े, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी 'तदर्थ' (Temporary) व्यवस्था का ही सहारा लिया गया।
नए प्रशासनिक फेरबदल के मुख्य बिंदु:
- प्रताप सिंह बघेल: अब तक बेसिक शिक्षा निदेशक का कार्यभार संभाल रहे प्रताप सिंह बघेल को पदोन्नत करते हुए प्रभारी माध्यमिक शिक्षा निदेशक की कमान सौंपी गई है।
- अनिल भूषण चतुर्वेदी: साक्षरता एवं वैकल्पिक शिक्षा निदेशक के पद पर कार्यरत अनिल भूषण चतुर्वेदी को अब प्रभारी बेसिक शिक्षा निदेशक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।
- गणेश कुमार: राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) जैसी शीर्ष संस्था के प्रभारी निदेशक गणेश कुमार भी मूल रूप से संयुक्त निदेशक स्तर के ही अधिकारी हैं।
3 साल से थमी DPC: प्रशासनिक संकट की असली वजह
इस पूरे संकट और 'प्रभारी राज' के पीछे कोई आकस्मिक कारण नहीं, बल्कि प्रशासनिक शिथिलता है। पिछले तीन वर्षों से शिक्षा विभाग में विभागीय प्रोन्नति कमेटी (DPC - Departmental Promotion Committee) की बैठक नहीं हुई है।- पदोन्नति पर ब्रेक: तीन साल से डीपीसी न होने के कारण निचले स्तर के योग्य (अर्ह) शिक्षाधिकारियों की समय पर पदोन्नति नहीं हो सकी।
- अतिरिक्त कार्यभार का बोझ: पदों के खाली होने से शासन को मजबूरन अपर शिक्षा निदेशक और संयुक्त निदेशक स्तर के अधिकारियों को ही शीर्ष पदों का अतिरिक्त प्रभार सौंपना पड़ रहा है।


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