नई दिल्ली, 30 मई 2026
देशभर के 14 लाख से अधिक शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख संगठन 'अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ' (ABRSM) ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा याचिका पर दिए गए हालिया फैसले पर गहरी चिंता और पीड़ा व्यक्त की है। महासंघ का कहना है कि इस अदालती निर्णय से वर्षों से पूरी निष्ठा के साथ स्कूलों में पढ़ा रहे लाखों शिक्षकों के सामने अचानक गहरा मानसिक तनाव और गंभीर आजीविका संकट खड़ा हो गया है।
वैधानिक प्रक्रिया से हुई थीं नियुक्तियाँ
महासंघ ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित होने वाले इन लाखों शिक्षकों की नियुक्तियां किसी अवैध तरीके से नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रचलित सरकारी नियमों, अधिसूचनाओं और सक्षम प्राधिकरणों द्वारा निर्धारित विधिवत प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए की गई थीं। इनमें से अधिकांश शिक्षकों ने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और रचनात्मक वर्ष देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने में लगा दिए हैं। उन्होंने सुदूर ग्रामीण, शहरी और वंचित क्षेत्रों के गरीब बच्चों के भविष्य को संवारने में अमूल्य योगदान दिया है। आज अचानक उनकी सेवा को संकट में डालना न्यायसंगत नहीं है।
सरकार के समक्ष महासंघ के प्रमुख बिंदु:
इस गंभीर प्रशासनिक और मानवीय संकट को देखते हुए, ABRSM ने देश की सरकार के समक्ष निम्नलिखित चार प्रमुख प्रशासनिक और कानूनी बिंदु विचारार्थ प्रस्तुत किए हैं:
- अपूरणीय क्षति का खतरा: वर्तमान कानूनी और तकनीकी उलझनों के कारण लाखों शिक्षकों को, जीवन की लंबी अवधि तक सराहनीय सेवाएं देने के बावजूद, ऐसी अपूरणीय क्षति उठानी पड़ सकती है जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं होगी।
- शैक्षणिक वातावरण पर प्रभाव: शिक्षकों की सेवा शर्तों और रोजगार पर अचानक उत्पन्न हुई इस अनिश्चितता के कारण देशभर के हजारों विद्यालयों के सुचारू संचालन तथा संपूर्ण शैक्षणिक वातावरण पर अत्यंत प्रतिकूल और नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
- मानवीय एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण: यह संवेदनशील विषय केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय और प्रशासनिक दोनों ही दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः इसमें देश के शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व और केंद्र सरकार के तत्काल और प्रभावी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
- विधायी संरक्षण का इतिहास: भारतीय प्रशासनिक इतिहास में पूर्व में भी ऐसी कई विषम परिस्थितियां आई हैं, जब व्यापक जनहित, सामाजिक न्याय और संस्थागत स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार ने विशेष विधायी उपायों अथवा संशोधनों के माध्यम से कर्मचारियों को सेवा संरक्षण प्रदान किया है।
अध्यादेश या विधायी संशोधन लाने की मांग
उपरोक्त संवेदनशील परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM) ने भारत सरकार से पुरजोर आग्रह किया है कि आगामी संसद के मानसून सत्र में उपयुक्त अध्यादेश (Ordinance) अथवा आवश्यक विधायी संशोधन लाकर इन प्रभावित शिक्षकों को अविलंब कानूनी व प्रशासनिक राहत प्रदान की जाए। महासंघ के अनुसार, सरकार द्वारा उठाया गया ऐसा कोई भी सकारात्मक कदम न केवल लाखों राष्ट्र-निर्माता शिक्षकों के हितों की रक्षा करेगा, बल्कि देश के शिक्षा क्षेत्र में निरंतरता, स्थिरता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में भी मील का पत्थर साबित होगा।
"शिक्षकों ने सदैव राष्ट्र के निर्माण और नई पीढ़ी के भविष्य को संवारने में अपनी अग्रणी भूमिका निभाई है। ऐसे में वे देश के तंत्र से न्याय, सहानुभूति और सेवा सुरक्षा की पूरी उम्मीद रखते हैं।"
महासंघ को पूरा विश्वास है कि केंद्र सरकार लाखों शिक्षकों की सामूहिक भावनाओं, परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और उनकी चिंताओं के प्रति पूरी तरह संवेदनशील रहेगी। सरकार इस गंभीर विषय पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए शीघ्र ही कोई निर्णायक और लोक-कल्याणकारी कदम उठाएगी।
अंतिम विकल्प के रूप में आंदोलन की चेतावनी
इसके साथ ही, ABRSM ने अत्यंत सम्मानपूर्वक परंतु दृढ़ता के साथ यह भी स्पष्ट किया है कि यदि समय रहते इन पीड़ित शिक्षकों को सरकार की ओर से कोई ठोस राहत नहीं मिलती है, तो शिक्षक समाज अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और आजीविका की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन का मार्ग चुनने के लिए बाध्य हो जाएगा। हालांकि, महासंघ ने यह उम्मीद भी जताई है कि सरकार के सकारात्मक, त्वरित और सक्रिय हस्तक्षेप के चलते देश में ऐसी किसी भी टकराव या आंदोलन की स्थिति उत्पन्न होने की नौबत नहीं आएगी।
— प्रो. गीता भट्ट, महासचिव (ABRSM)



Social Plugin