लखनऊ। निजी स्कूलों के प्रबंधन और अभिभावकों के अधिकारों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा और यू-टर्न लेने वाला फैसला किया है। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि निजी स्कूलों की स्कूल प्रबंध समिति (SMC - School Management Committee) का अध्यक्ष अब अभिभावकों को नहीं बनाया जाएगा।
कुछ समय पहले ही मंत्रालय ने सभी सरकारी और निजी स्कूलों के लिए एक समान गाइडलाइन जारी की थी, लेकिन अब नए आदेश के जरिए निजी स्कूलों को इस अनिवार्य नियम से बाहर कर दिया गया है।
हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से एक पत्र जारी किया गया था। इस पत्र में निर्देश दिए गए थे कि सरकारी स्कूलों की तर्ज पर अब प्राइवेट स्कूलों में भी स्कूल प्रबंध समिति (SMC) का अध्यक्ष किसी अभिभावक (Parent) को ही बनाया जाए। इस फैसले का उद्देश्य निजी स्कूलों के संचालन में पारदर्शिता लाना और अभिभावकों की भागीदारी बढ़ाना था।
नया बदलाव: शिक्षा मंत्रालय ने इस संबंध में दोबारा सभी राज्यों को एक नया स्पष्टीकरण पत्र जारी किया है। इसमें साफ कहा गया है कि पिछला निर्देश केवल सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए ही प्रभावी रहेगा। निजी स्कूलों में अभिभावक को अध्यक्ष बनाने की व्यवस्था अनिवार्य नहीं होगी।
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का मुख्य आदेश
- प्राइवेट स्कूलों को छूट: स्कूल प्रबंध समिति (SMC) के अध्यक्ष पद पर अभिभावक की नियुक्ति का नियम अब निजी स्कूलों (Private Schools) पर लागू नहीं होगा।
- सरकारी स्कूलों में यथास्थिति: यह व्यवस्था केवल सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त (Aided) स्कूलों में ही अनिवार्य रूप से लागू रहेगी।
- राज्यों को नया स्पष्टीकरण: केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नया पत्र जारी कर इस बात को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
इस आदेश का सीधा असर क्या होगा?
- स्कूल प्रबंधन का नियंत्रण: अब निजी स्कूलों की प्रबंध समिति के अध्यक्ष पद पर स्कूल मैनेजमेंट या ट्रस्ट का ही कोई व्यक्ति बैठ सकेगा।
- अभिभावकों के अधिकार सीमित: नीति निर्धारण, स्कूल के प्रशासनिक फैसलों और वित्तीय मैनेजमेंट में अब अभिभावकों के पास सीधे तौर पर वीटो पावर या अध्यक्षता का अधिकार नहीं रहेगा।
आदेश से उपजा विवाद
- मनमानी फीस वृद्धि की आशंका: शिक्षक संगठनों (जैसे माध्यमिक शिक्षक संघ) का मानना है कि इस आदेश से निजी स्कूलों को मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने और अपनी मर्जी से स्कूल चलाने की खुली छूट मिल सकती है।
- RTE की भावना के विपरीत: आलोचकों का कहना है कि यह फैसला शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत अभिभावकों को मजबूत बनाने की कोशिशों को कमजोर करता है।
शिक्षा मंत्रालय के इस नए स्पष्टीकरण से निजी स्कूल संचालकों ने बड़ी राहत की सांस ली है, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके आंतरिक फैसलों या वित्तीय मामलों में अभिभावकों का सीधा दखल हो। दूसरी ओर, छात्र संघों और अभिभावक वेलफेयर एसोसिएशन्स का मानना है कि इस फैसले से निजी स्कूलों में 'राइट टू एजुकेशन' (RTE) की मूल भावना कमजोर होगी और फीस नियंत्रण व अन्य प्रशासनिक मुद्दों पर अभिभावकों की आवाज को दबा दिया जाएगा।


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