लखनऊ/प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत प्रभारी प्रधानाध्यापकों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक अपडेट सामने आई है। प्रभारी प्रधानाध्यापकों को नियमित (परमानेंट) प्रधानाध्यापक के पद के समान वेतनमान देने के संदर्भ में दायर याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ खंडपीठ) ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए अंतिम 3 सप्ताह का समय प्रदान किया है। न्यायालय के इस आदेश के बाद अब इस दीर्घकालिक विवाद में न्याय की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।
कोर्ट की कार्यवाही और आदेश का मुख्य अंश
यह आदेश मा. उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के कोर्ट नंबर 17 में माननीय न्यायमूर्ति राजीव सिंह (Hon'ble Rajeev Singh, J.) द्वारा ऋत याचिका संख्या (WRIT - A No.) 4749/2026 (पूर्णेश कुमार शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य) की सुनवाई के दौरान पारित किया गया।
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित विधिक समय-सीमा तय की है:
- सरकार को 3 सप्ताह का समय: न्यायालय ने विपक्षी (बेसिक शिक्षा विभाग व राज्य सरकार) के विद्वान अधिवक्ता को निर्देश दिया है कि वे याचिका में उठाए गए बिंदुओं पर अपना आधिकारिक प्रतिशपथ पत्र (Counter Affidavit) तीन सप्ताह के भीतर दाखिल करें।
- याचिकाकर्ता को प्रत्युत्तर का अवसर: सरकार का जवाब आने के बाद, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को उसका प्रत्युत्तर (Rejoinder Affidavit) दाखिल करने के लिए 1 सप्ताह का अतिरिक्त समय मिलेगा।
- मामले की अगली सुनवाई (20 जुलाई 2026): कोर्ट ने इस केस को आगामी 20 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में अंतिम रूप से सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। साथ ही इसे एक अन्य मुख्य याचिका (Writ A No. 12736/2025) के साथ संबद्ध (Tag) कर दिया गया है ताकि दोनों मामलों का निस्तारण एक साथ हो सके।
क्या है पूरा मामला और 'समान कार्य-समान वेतन' का विवाद?
उत्तर प्रदेश के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में हजारों शिक्षक वर्षों से 'प्रभारी प्रधानाध्यापक' (Acting Headmaster) के रूप में विद्यालय के संचालन और प्रशासनिक दायित्वों का पूर्ण निर्वहन कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का पक्ष रख रहे विद्वान अधिवक्ता दुर्गा प्रसाद शुक्ला की दलील है कि जब प्रभारी प्रधानाध्यापक पूरी तरह से एक नियमित प्रधानाध्यापक के बराबर कार्य कर रहे हैं और सभी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं, तो उन्हें वेतनमान से वंचित रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 39(d) के तहत 'समान कार्य के लिए समान वेतन' के मूल सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन है।
दूसरी ओर, विभाग अब तक वित्तीय और तकनीकी विसंगतियों का हवाला देकर नियमित वेतनमान देने से बचता आया है, परंतु अब हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद सरकार को लिखित रूप में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
केस का संक्षिप्त विवरण (Case Summary)
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ (Court No. 17)
- केस संख्या: WRIT - A No. - 4749 Of 2026
- याचिकाकर्ता: पूर्णेश कुमार शुक्ला (Purnesh Kumar Shukla)
- विपक्षी: उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा अपर मुख्य सचिव, बेसिक शिक्षा विभाग, लखनऊ एवं अन्य
- याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: दुर्गा प्रसाद शुक्ला
- विपक्षी के अधिवक्ता: सी.एस.सी. (C.S.C.), रन विजय सिंह एवं ऋषभ त्रिपाठी
- अगली सुनवाई की तिथि: 20 जुलाई 2026
शिक्षकों में जगी बड़ी राहत की उम्मीद
अदालत के इस आदेश से प्रदेश भर के पीड़ित प्रभारी प्रधानाध्यापकों और शिक्षक संगठनों में न्याय की नई उम्मीद जगी है। विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि 20 जुलाई 2026 को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले में बेहद निर्णायक साबित होगी। यदि सरकार तय समय-सीमा के भीतर ठोस और संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती है, तो कोर्ट शिक्षकों के पक्ष में अंतरिम राहत या अंतिम आदेश पारित कर सकता है। फिलहाल, उत्तर प्रदेश के समस्त शैक्षिक हलकों की निगाहें अब 20 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हुई हैं।



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