प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के हजारों शिक्षामित्रों के भविष्य को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) को आदेश दिया है कि वे शिक्षामित्रों के नियमितीकरण और उन्हें सहायक अध्यापक के समान वेतन देने की मांग पर दो महीने के भीतर विचार कर सकारण आदेश (Reasoned Order) जारी करें।
क्या है पूरा मामला?
यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने देवरिया जनपद की शिक्षामित्र निघत फिरदौस द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है। याची का तर्क था कि वह लंबे समय से प्राथमिक विद्यालय में शिक्षामित्र के रूप में अपनी सेवाएँ दे रही हैं और अब वे नियमित होने की हकदार हैं।
याचिका के मुख्य आधार
सुनवाई के दौरान याची की ओर से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और केंद्रीय दिशा-निर्देशों का हवाला दिया गया:
- जग्गो बनाम भारत संघ और श्रीपाल व अन्य के मामलों में दिए गए न्यायिक दृष्टांत।
- 4 जून 2025 को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी किए गए विशेष निर्देश।
- इन आधारों पर मांग की गई कि उन्हें सहायक अध्यापक के पद पर नियमित कर उसी श्रेणी का वेतनमान दिया जाए।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश
अदालत ने पूर्व में हुए तेज बहादुर मौर्य व 44 अन्य के मामले का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान मुद्दा भी उसी के समान है। कोर्ट ने प्रक्रिया को गति देते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- प्रत्यावेदन: याची को निर्देश दिया गया है कि वह तीन सप्ताह के भीतर अपनी मांगों के समर्थन में एक नया विस्तृत प्रत्यावेदन विभाग को सौंपे।
- समय सीमा: अपर मुख्य सचिव, बेसिक शिक्षा को इस प्रत्यावेदन पर दो माह के भीतर विचार करना होगा।
- सकारण आदेश: विभाग को केवल निर्णय ही नहीं लेना है, बल्कि उसे कानूनी तर्कों के साथ एक स्पष्ट आदेश पारित करना होगा।
महत्व: इस फैसले से उन शिक्षामित्रों में उम्मीद की किरण जागी है जो लंबे समय से समान कार्य के लिए समान वेतन और स्थायीकरण की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह हाईकोर्ट के इस निर्देश पर क्या रुख अपनाती है।


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