प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में पुरानी पेंशन योजना (OPS) को लेकर एक बार फिर सुगबुगाहट तेज हो गई है। इस बार आश्रित कल्याण समिति (संघ) ने मोर्चा संभालते हुए उन मृत आश्रित शिक्षकों और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के हक में आवाज उठाई है, जिनकी नियुक्ति की समय सीमा 1 अप्रैल 2005 से पहले की है। समिति ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि इन कर्मचारियों को उनका वाजिब हक दिया जाए।
क्या है मुख्य विवाद?
मामले की जड़ में वह तकनीकी विसंगति है जिसके कारण 1 अप्रैल 2005 से पूर्व नियुक्त कई कर्मचारियों को पेंशन के दायरे से बाहर कर दिया गया है। समिति के अनुसार, बेसिक शिक्षा परिषद में कार्यरत ऐसे कई शिक्षक हैं जिनकी पूरी सर्विस के दौरान जी०पी०एफ० (GPF) की कटौती की गई, लेकिन जब बात पेंशन की आई तो उन्हें नियमों का हवाला देकर रोक दिया गया। संगठन का दावा है कि बिना किसी ठोस कारण के जी०पी०एफ० कटौती को रोकना और पेंशन से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।
अदालती कार्यवाही और कानूनी पेंच
यह मामला केवल कागजों तक सीमित नहीं है। उच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर कर्मचारियों के पक्ष में फैसले सुनाए हैं। हालांकि, वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई सिविल अपील (संख्या 8040/2019) की वजह से यह प्रकरण लंबित है। समिति का तर्क है कि सरकार को मानवीय आधार पर विचार करते हुए इन परिवारों को राहत देनी चाहिए, क्योंकि ये कर्मचारी पहले ही कई अभावों का सामना कर रहे हैं।
समिति का कड़ा रुख
प्रदेश अध्यक्ष प्रभात कुमार और महासचिव विनय कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में संगठन ने शासन को स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री बल्कि अपर मुख्य सचिव और क्षेत्रीय विधायकों को भी इस समस्या से अवगत कराया है। समिति का मानना है कि यदि समय रहते इन विसंगतियों को दूर नहीं किया गया, तो यह कर्मचारियों के साथ एक बड़ा विश्वासघात होगा।
निष्कर्ष: पुरानी पेंशन का यह मुद्दा अब केवल एक प्रशासनिक फाइल नहीं, बल्कि हजारों आश्रित परिवारों के सम्मान और जीवन यापन का सवाल बन चुका है। अब सबकी नजरें लखनऊ के फैसले पर टिकी हैं।


Social Plugin