क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर तहसीलदार ने रोका 34 शिक्षकों का वेतन, भड़का शिक्षा विभाग
उन्नाव। अपने फैसलों और कार्यशैली को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाले हसनगंज के तहसीलदार अवनीश चौधरी एक बार फिर विवादों में हैं। इस बार उन्होंने राजस्व विभाग की सीमाएं लांघकर सीधे बेसिक शिक्षा विभाग (BSA) के अधिकारों में दखल दे दिया है। जनगणना कार्य में धीमी प्रगति का हवाला देते हुए तहसीलदार ने खुद 'बीएसए' की भूमिका अख्तियार कर ली और 34 शिक्षकों, अनुदेशकों व शिक्षामित्रों का वेतन रोकने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया। तहसीलदार के इस कदम से पूरे शिक्षा महकमे में आक्रोश है और उनके क्षेत्राधिकार पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
बीते 6 जून को हसनगंज तहसील के चार्ज अधिकारी (ग्रामीण) व तहसीलदार अवनीश चौधरी ने जनगणना कार्यों की समीक्षा की थी। समीक्षा के दौरान एचएलबी क्षेत्र में प्रगणकों और पर्यवेक्षकों द्वारा किए जा रहे कार्य की प्रगति संतोषजनक नहीं पाई गई। तहसीलदार का मानना था कि 10 जून तक तय 90 फीसदी कार्य का लक्ष्य शिक्षकों की लापरवाही के कारण प्रभावित हो रहा है।
इस पर नाराजगी जताते हुए तहसीलदार ने अपने स्तर से ही एक आदेश जारी कर पर्यवेक्षक मनोज कुमार, कनक लता मिश्रा, शगुन भारती, अरुण कुमार कन्नौजिया और प्रगणक अंजू वर्मा, नित्या त्रिपाठी, श्वेता निगम समेत कुल 34 कर्मियों का वेतन व मानदेय तत्काल प्रभाव से रोक दिया।
नियम क्या कहते हैं?
शिक्षक संगठनों और जानकारों का कहना है कि तहसीलदार को किसी भी शिक्षक या शिक्षा विभाग के कर्मचारी का वेतन सीधे रोकने या काटने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। नियम के मुताबिक:
- जनगणना या अन्य ड्यूटी में लापरवाही बरतने पर तहसीलदार सिर्फ संबंधित विभाग के अध्यक्ष (इस मामले में बीएसए) को कार्रवाई के लिए संस्तुति (सिफारिश) भेज सकते हैं।
- अंतिम अनुशासनात्मक कार्रवाई या वेतन रोकने का अधिकार केवल जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) के पास ही सुरक्षित है।


