इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को टालने और प्रधानों का बतौर प्रशासक कार्यकाल बढ़ाने के सरकार के फैसलों पर गहरा असंतोष जाहिर किया है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 243ई का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए निर्धारित है और ऐसी किसी भी स्थिति में पांच वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है, जिसमें राज्य सरकार के गत 25 और 26 मई के आदेशों को चुनौती दी गई थी. कोर्ट ने कहा कि सरकार किसी भी अध्यादेश या कानून का सहारा लेकर पंचायतों के कार्यकाल को पांच साल से आगे नहीं बढ़ा सकती है। न्यायालय का मानना है कि सरकार के ये आदेश संविधान की मंशा के विपरीत हैं, इसलिए ग्राम प्रधानों को प्रशासक के तौर पर पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि वे चुनाव कराने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं और इसके लिए 10 जून को मतदाता सूची भी प्रकाशित की जा चुकी है। आयोग ने कोर्ट को अवगत कराया कि राज्य सरकार द्वारा जरूरी व्यवस्थाएं उपलब्ध न कराए जाने के कारण ही चुनाव प्रक्रिया में बाधा आ रही है।


