दुनिया भर में पेट्रोल 30% महंगा, भारत में भी बढ़ी कीमतें बढ़ने की सुगबुगाहट
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में गहराते सैन्य संघर्ष और अस्थिरता ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनें तेज कर दी हैं। कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में 30 प्रतिशत से अधिक का उछाल आया है। जहाँ दुनिया के विकसित देशों ने इसका बोझ तुरंत जनता पर डाल दिया है, वहीं भारत सरकार वर्तमान में भारी घाटा सहकर भी कीमतों को स्थिर रखे हुए है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत अधिक समय तक जारी रहना मुश्किल है।
दुनिया के विकसित देशों में हाहाकार
रिपोर्ट्स के अनुसार, तेल संकट का सबसे बुरा असर यूरोप और पूर्वी एशिया के विकसित देशों पर पड़ा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम 25 से 35 फीसदी तक बढ़ चुके हैं।
उदाहरण के तौर पर, सिंगापुर में पेट्रोल की कीमतें 30% बढ़कर करीब ₹240 प्रति लीटर तक पहुँच गई हैं। इसी तरह नीदरलैंड में यह ₹225 और जर्मनी में ₹205 के स्तर को छू रही हैं। इसकी तुलना में भारत में पेट्रोल की औसत कीमत लंबे समय से ₹95 के आसपास स्थिर बनी हुई है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।
भारत सरकार पर बढ़ता वित्तीय बोझ
भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के बावजूद घरेलू बाजार में दाम न बढ़ाने के कारण सरकारी खजाने और तेल कंपनियों पर दोहरा दबाव पड़ रहा है:
- कंपनियों का नुकसान: अप्रैल के अंत तक भारतीय पेट्रोलियम कंपनियों का कुल घाटा 30,000 करोड़ रुपये को पार कर चुका है। आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों को पेट्रोल पर ₹24 और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर का घाटा उठाना पड़ रहा है।
- राजस्व की हानि: जनता को राहत देने के लिए सरकार ने उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में प्रति लीटर ₹10 की कटौती की थी, जिससे अप्रैल अंत तक सरकार को ₹35,000 करोड़ के राजस्व की चपत लगी है।
एलपीजी (LPG) संकट और नई रणनीति
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) से होने वाली सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे एलपीजी की उपलब्धता कम हुई है। भारत ने स्थिति को संभालने के लिए अब केवल अरब देशों पर निर्भर रहने के बजाय दुनिया के 41 अन्य देशों से पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद शुरू कर दी है।
हालांकि, लंबे समुद्री रास्तों के चयन के कारण परिवहन लागत (Freight Cost) बढ़ गई है। इसके बावजूद, सरकार ने बढ़ी हुई लागत का बोझ फिलहाल केवल वाणिज्यिक (Commercial) उपभोक्ताओं पर डाला है, जबकि घरेलू रसोई गैस की कीमतों को अभी भी सुरक्षित रखा गया है।
क्या आगे बढ़ेंगे दाम?
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो भारत सरकार के लिए इस भारी घाटे को लंबे समय तक वहन करना असंभव होगा। ऐसी अटकलें हैं कि आने वाले कुछ दिनों में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कुछ बढ़ोतरी देखी जा सकती है। फिलहाल, सरकार विभिन्न देशों से तेल खरीद के नए मार्ग तलाश रही है ताकि संकट के प्रभाव को कम किया जा सके।


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