प्रयागराज: न्याय में देरी को लेकर अक्सर न्यायपालिका की आलोचना होती है, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश के जरिए इस धारणा की दूसरी परत को सामने रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुकदमों के लंबित होने और अदालतों में लगने वाले चक्करों के लिए केवल न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि सरकारी तंत्र, लचर पुलिस व्यवस्था और संसाधनों की कमी भी समान रूप से दोषी है।
फिल्म 'दामिनी' के डायलॉग का जिक्र
न्यायमूर्ति अरुण देशवाल ने एक हत्यारोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सनी देओल के मशहूर डायलॉग "तारीख पे तारीख" का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह संवाद इसलिए लोकप्रिय हुआ क्योंकि यह आम आदमी की पीड़ा को दर्शाता है। कोर्ट ने माना कि समाज में यह धारणा बन गई है कि देरी केवल जजों की वजह से होती है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
सिस्टम की इन 4 बड़ी कमियों पर उठाया सवाल
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उन प्रमुख कारणों को गिनाया है जो न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार को धीमा करते हैं:
- पुलिस का असहयोग: न्यायिक अधिकारी पुलिस की मदद के बिना फैसला नहीं सुना सकते। गवाहों को समय पर पेश करना, अभियुक्तों की उपस्थिति सुनिश्चित करना और वारंट की तामील करना पूरी तरह पुलिस की जिम्मेदारी है, जिसमें अक्सर कोताही बरती जाती है।
- दोषपूर्ण जांच और FSL रिपोर्ट: खराब जांच और फोरेंसिक लैब (FSL) से समय पर रिपोर्ट न मिलना ट्रायल में देरी का सबसे बड़ा कारण बनता है।
- स्टाफ और संसाधनों की कमी: कोर्ट में पर्याप्त स्टाफ न होना न्यायिक अधिकारियों के हाथ बांध देता है।
- सुरक्षा का अभाव: न्यायमूर्ति ने चिंता जताई कि न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त व्यक्तिगत सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं कराई जाती, जो उनके कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करती है।
इंसाफ केवल जज के हाथ में नहीं
अदालत ने साफ किया कि कई न्यायिक अधिकारी न्याय देने के जज्बे के साथ सिस्टम में आते हैं, लेकिन प्रशासनिक तंत्र की विफलताओं के कारण वे प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाते। कोर्ट का संदेश स्पष्ट है: यदि हम 'तारीख पर तारीख' की संस्कृति को खत्म करना चाहते हैं, तो केवल जजों की संख्या बढ़ाना काफी नहीं है; हमें पुलिस सुधार और अदालती संसाधनों के आधुनिकीकरण पर भी ध्यान देना होगा।
"न्याय केवल अदालती कमरों में नहीं होता, इसके पीछे एक मजबूत प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की जरूरत होती है।" - हाईकोर्ट की टिप्पणी का सार


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