उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक एक नई और पारदर्शी मूल चयन सूची (Original Merit List) तैयार करे और उसे अदालत के समक्ष पेश करे।
सरकार ने मांगा समय, कोर्ट ने दी मंजूरी
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट से नई सूची तैयार करने के लिए 6 से 8 सप्ताह का समय मांगा।
- नियमों का पालन: सरकार ने भरोसा दिलाया कि हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के 13 अगस्त 2024 के आदेश के अनुसार, पूरी लिस्ट को बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 और आरक्षण नियमावली 1994 के तहत कड़ाई से तैयार किया जाएगा।
- पीड़ितों को न्याय का भरोसा: जस्टिस दीपांकर दत्ता के एक सवाल के जवाब में ASG भाटी ने स्पष्ट किया कि आरक्षण विसंगतियों के कारण जिन पात्र उम्मीदवारों के साथ अन्याय हुआ है, सरकार उन्हें नौकरी देने पर सकारात्मक रूप से विचार करेगी। इस आश्वासन पर सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जताते हुए सभी याचिकाओं को फिलहाल लंबित रखा है।
सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की बढ़ी चिंता
इस मामले में सामान्य वर्ग (General Category) के उम्मीदवारों के वकीलों ने कोर्ट के सामने अपनी चिंताएं साझा कीं।
अधिवक्ता की दलील: "अगर 69 हजार सहायक शिक्षकों की पूरी सूची को दोबारा मूल चयन सूची के रूप में बनाया गया, तो कई ऐसे लोग नौकरी से बाहर हो जाएंगे जो पिछले काफी समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।"
गौरतलब है कि इस भर्ती में सामान्य श्रेणी का कट-ऑफ 67.11 और ओबीसी (OBC) का कट-ऑफ 66.73 रहा था। अब नई सूची बनने से मैरिट में बड़े बदलाव की आशंका है, जिससे वर्तमान में कार्यरत कई शिक्षकों की कुर्सी पर खतरा मंडरा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग को अगले दो महीनों के भीतर पूरी चयन सूची को खंगालना होगा। कोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण नियमों का पूरी तरह पालन हो और किसी भी योग्य उम्मीदवार के साथ अन्याय न हो। अब सभी की नजरें सरकार द्वारा पेश की जाने वाली अगली पारदर्शी सूची पर टिकी हैं।
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