लखनऊ: उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ ने 2026 की जनगणना में शिक्षकों की ड्यूटी को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संघ की प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सुलोचना मौर्या ने जनगणना कार्य निदेशक (उत्तर प्रदेश) को पत्र लिखकर मांग की है कि शिक्षकों के शैक्षणिक कार्यों और जनगणना के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए विशेष रियायतें दी जाएं।
प्रमुख मांगें और समाधान के प्रस्ताव
संघ ने अपनी मांग पत्र में सात मुख्य बिंदुओं को रेखांकित किया है, जो शिक्षकों के मनोबल और कार्यक्षमता को प्रभावित कर रहे हैं:
- बीमार और दिव्यांगों को मुक्ति: दिव्यांग शिक्षकों और पुरानी या गंभीर बीमारियों (क्रोनिक इलनेस) से ग्रसित शिक्षकों को जनगणना कार्य से पूरी तरह मुक्त रखा जाए।
- महिला शिक्षकों के लिए राहत: गर्भवती महिलाओं, गंभीर रूप से बीमार महिला कर्मियों और उन माताओं को राहत दी जाए जो छोटे बच्चों की देखभाल कर रही हैं।
- सेवानिवृत्ति के करीब वाले शिक्षक: ऐसे शिक्षक और कर्मचारी जिनकी सेवानिवृत्ति (Retirement) में केवल 2 वर्ष का समय शेष है, उन्हें इस भारी कार्यभार से छूट दी जाए।
- काम का उचित बँटवारा: शिक्षकों पर अनावश्यक अतिरिक्त कार्यभार न डाला जाए और काम का विभाजन व्यावहारिक तरीके से किया जाए।
- उचित मानदेय और अवकाश: जनगणना कार्य में लगे शिक्षकों को शासनादेश के अनुरूप उचित मानदेय दिया जाए और काम के बदले प्रतिकर अवकाश (Compensatory Leave) की सुविधा प्रदान की जाए।
- सुरक्षा और सुविधाएं: कार्य के दौरान शिक्षकों, विशेषकर महिला शिक्षकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य मूलभूत सुविधाओं का पुख्ता इंतजाम किया जाए।
"शिक्षा और प्रशासनिक कार्यों में संतुलन जरूरी"
डॉ. सुलोचना मौर्या ने पत्र में स्पष्ट किया कि शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट रहे हैं, लेकिन उनकी मूल जिम्मेदारी छात्रों को शिक्षित करना है। अत्यधिक कार्यभार से शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने प्रशासन से निवेदन किया है कि इन मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं ताकि शिक्षक अपनी ड्यूटी पूरी निष्ठा और दक्षता के साथ निभा सकें।
उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ द्वारा जारी इस मांग पत्र ने एक बार फिर शिक्षकों पर बढ़ते गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ की चर्चा छेड़ दी है। अब देखना यह है कि प्रशासन इन मांगों पर क्या कदम उठाता है।


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