लखनऊ/प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षकों की भर्ती का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे सिविल अपील संख्या 4139/2024 (अर्चना राय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) के मामले में सचिव, बेसिक शिक्षा परिषद (प्रयागराज) द्वारा दाखिल एक हलफनामे ने 12460 शिक्षक भर्ती के भविष्य को लेकर स्पष्टता दी है। लेकिन इस सक्रियता ने राज्य की दो अन्य बड़ी भर्तियों—69000 और 72825—के अभ्यर्थियों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।
12460 भर्ती: सुप्रीम कोर्ट में विभाग का पक्ष
सचिव सुरेंद्र कुमार तिवारी द्वारा दाखिल हलफनामे के अनुसार, माननीय न्यायालय के 29 जनवरी 2026 के आदेश के अनुपालन में विभाग ने मेरिट लिस्ट तैयार कर ली है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि:
- नियम 14(1)(a) के तहत आने वाले अभ्यर्थियों और इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशन (IA) दाखिल करने वालों की पहचान कर ली गई है।
- कुल 777 मुख्य अपीलकर्ता और 1437 IA आवेदकों की सूची तैयार की गई है।
- जीरो वैकेंसी वाले जिलों के 612 अभ्यर्थियों का विवरण भी कोर्ट के सामने रखा गया है।
- विभाग ने भरोसा दिलाया है कि 15.12.2016 के विज्ञापन की मेरिट के आधार पर नियुक्तियों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।
69000 और 72825 भर्ती: उपेक्षा का शिकार?
जहाँ एक तरफ 12460 भर्ती में विभाग कोर्ट के आदेशों पर त्वरित प्रतिक्रिया दे रहा है, वहीं 69000 शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थी आरक्षण विसंगतियों और मेरिट सूची को लेकर सालों से सड़कों पर हैं। इसी तरह, 72825 प्रशिक्षु शिक्षक भर्ती के बचे हुए पदों और फीस वापसी जैसे मुद्दों पर भी विभाग का रवैया सुस्त बना हुआ है।
अभ्यर्थियों के मुख्य सवाल:
- यदि 12460 भर्ती में डेटा कंपाइल कर हलफनामा दिया जा सकता है, तो 69000 भर्ती की विसंगतियों को दूर करने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?
- 72825 भर्ती के हजारों अभ्यर्थी आज भी अपनी बहाली या न्याय की बाट क्यों जोह रहे हैं?
- क्या विभाग केवल उन्हीं मामलों में सक्रिय होता है जहाँ कोर्ट का अत्यधिक दबाव हो?
निष्कर्ष
बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा 12460 भर्ती में पेश किया गया डेटा यह तो साबित करता है कि विभाग के पास तंत्र मौजूद है, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी 69000 और 72825 के अभ्यर्थियों के लिए मुसीबत बनी हुई है। कोर्ट में 18 मार्च 2026 की अगली सुनवाई 12460 भर्ती का भविष्य तय करेगी, लेकिन सरकार को यह समझना होगा कि न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है।





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