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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: नियुक्ति से पूर्व किया गया विवाह 'दुराचरण' की श्रेणी में नहीं

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी सेवा में आने से पहले किसी महिला द्वारा विवाहित व्यक्ति से की गई दूसरी शादी को 'कदाचार' या 'दुराचरण' (Misconduct) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवा नियमावली के नियम केवल सेवारत कर्मचारियों पर लागू होते हैं, न कि नियुक्ति से पहले के उनके निजी जीवन पर।

Allahabad High Court Decision

क्या था पूरा मामला?

​मामला वर्ष 2015 का है, जब रीना नामक एक महिला की नियुक्ति प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक के पद पर हुई थी। नियुक्ति के बाद उनके विरुद्ध एक शिकायत दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया है जो पहले से ही शादीशुदा था और उसकी पत्नी जीवित थी। इस आधार पर विभाग ने बिना किसी विस्तृत जाँच के उनकी सेवा समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया था।

​शिक्षिका ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि:

  • ​सेवा समाप्ति से पहले कोई उचित जाँच नहीं की गई।
  • ​उन्हें अपने पति के पहले विवाह की कोई जानकारी नहीं थी।
  • ​यह विवाह उनकी सरकारी सेवा में आने (2015) से काफी पहले (2009) हुआ था।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

​न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रखे:

  • आचरण नियमावली की सीमा: 'यूपी सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली, 1956' का नियम 29(2) महिला कर्मचारियों को बिना अनुमति विवाहित पुरुष से शादी करने से रोकता है। लेकिन, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम केवल उन पर लागू होता है जो पहले से सरकारी सेवा में हैं
  • भूतलक्षी प्रभाव नहीं: कोर्ट ने कहा कि 2015 में नियुक्त हुई शिक्षिका पर 2009 में किए गए किसी कार्य के लिए सेवा नियमावली के उल्लंघन का आरोप नहीं लगाया जा सकता। नियुक्ति से पहले के किसी कृत्य को 'सर्विस मिसकंडक्ट' नहीं माना जा सकता।
  • अधिकार क्षेत्र: यूपी बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 के तहत राज्य सरकार को सेवा शर्तें तय करने का अधिकार है, लेकिन नियमों का हवाला देकर किसी के अतीत के आधार पर वर्तमान सेवा समाप्त करना तर्कसंगत नहीं है।

हाई कोर्ट का आदेश

​अदालत ने शिक्षिका की सेवा समाप्ति के आदेश को रद (Quash) कर दिया है। साथ ही, प्रतिवादी अधिकारियों को निर्देश दिया है कि यदि वे कोई नई कार्यवाही करना चाहते हैं, तो याची को उचित नोटिस दें और उनकी बात सुनने के बाद ही कोई न्यायसंगत आदेश पारित करें।

निष्कर्ष: 

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि सरकारी कर्मचारियों के निजी जीवन और सेवा पूर्व के कृत्यों को तब तक सेवा शर्तों के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता, जब तक कि वे सीधे तौर पर नियुक्ति की पात्रता को प्रभावित न करते हों।


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