भारत में सामाजिक मान्यताओं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच की दूरी अब कम होती दिख रही है। हाल ही में शासन और न्यायपालिका की ओर से आए दो बड़े फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक समाज में लिव-इन रिलेशनशिप को अब एक नई दृष्टि से देखा जाएगा। जहाँ एक तरफ प्रशासनिक स्तर पर इसे आधिकारिक पहचान मिल रही है, वहीं न्यायिक स्तर पर इसे संवैधानिक सुरक्षा कवच प्रदान किया जा रहा है।
देश की आगामी जनगणना को लेकर केंद्र सरकार ने एक प्रगतिशील रुख अपनाया है। जनगणना आयुक्त के कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, अब डिजिटल माध्यम से अपनी जानकारी दर्ज करने वाले नागरिकों के लिए नियमों में बदलाव किया गया है। यदि दो वयस्क व्यक्ति आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं और एक-दूसरे को स्थायी जीवनसाथी के रूप में देखते हैं, तो उन्हें जनगणना के आंकड़ों में एक विवाहित जोड़े के समान ही दर्ज किया जाएगा। यह निर्णय इस लिहाज से क्रांतिकारी है क्योंकि यह सरकारी रिकॉर्ड में पारंपरिक विवाह के इतर संबंधों को भी स्थान देता है, जिससे भविष्य की सरकारी नीतियों का निर्धारण अधिक सटीक और समावेशी हो सकेगा।
प्रशासनिक स्तर पर पहचान मिलने के साथ ही, न्यायपालिका ने भी इस विषय पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट कर दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कानून की दृष्टि में कोई अपराध नहीं है। माननीय न्यायालय ने अपने फैसले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 पर विशेष जोर देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने यह भी साफ किया कि जब दो बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो उनके निजी मामलों में परिवार, समाज या स्वयं राज्य का भी कोई हस्तक्षेप उचित नहीं है।
विशेषकर अंतरधार्मिक जोड़ों के संदर्भ में, न्यायपालिका का रुख और भी सख्त रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक भिन्नता के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव करना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। जब तक किसी रिश्ते में दबाव या जबरन धर्म परिवर्तन जैसे तत्व मौजूद नहीं हैं, तब तक किसी भी कानून के तहत ऐसे जोड़ों को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने पुलिस और प्रशासन को भी निर्देश दिए हैं कि सुरक्षा की मांग करने वाले ऐसे जोड़ों को हर संभव सहायता प्रदान की जाए ताकि वे बिना किसी भय के अपने जीवन के अधिकार का उपभोग कर सकें।
निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो ये बदलाव भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाते हैं। जनगणना में स्थान मिलना सामाजिक स्वीकृति की दिशा में एक कदम है, तो न्यायालय का संरक्षण व्यक्तिगत आजादी की जीत है। यह स्पष्ट है कि अब व्यवस्था नागरिक की निजता और उसकी पसंद को अधिक सम्मान देने की दिशा में अग्रसर है।


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