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बेसिक शिक्षा परिषद शिक्षक समायोजन में कई विसंगतियाँ आईं सामने, एक समान नीति लागू करने की उठी मांग

Sir Ji Ki Pathshala 0

लखनऊ। उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा जारी शिक्षक समायोजन प्रक्रिया को लेकर प्रदेशभर के शिक्षकों में असंतोष देखने को मिल रहा है। विभिन्न जनपदों की समायोजन सूचियों के अध्ययन के बाद कई ऐसी विसंगतियाँ सामने आई हैं, जिनके कारण समायोजन प्रक्रिया की पारदर्शिता और एकरूपता पर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि अलग-अलग जिलों में अलग-अलग मानकों के आधार पर समायोजन किया गया है, जबकि पूरे प्रदेश में एक समान नीति लागू होनी चाहिए।

समायोजन सूची के शुरुआती लगभग 2500 पृष्ठों के अध्ययन में यह देखा गया कि कई जनपदों में 150 से कम छात्र संख्या होने के बावजूद प्रधानाध्यापक (HM) को सरप्लस घोषित नहीं किया गया, जबकि भदोही, चंदौली, बदायूँ, बलरामपुर, श्रावस्ती, कौशांबी, मिर्जापुर, सिद्धार्थनगर, जौनपुर, लखीमपुर खीरी, सोनभद्र, कासगंज, मेरठ, आगरा, पीलीभीत, मथुरा और एटा सहित कई जनपदों में समान परिस्थितियों में प्रधानाध्यापक को सरप्लस घोषित कर दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि समायोजन के लिए पूरे प्रदेश में एक समान मानक लागू नहीं किए गए।

बेसिक शिक्षा परिषद शिक्षक समायोजन 2026 में सामने आई प्रमुख विसंगतियाँ और एक समान नीति की मांग

शिक्षकों का यह भी कहना है कि कई जिलों में 150 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में प्रधानाध्यापक को यथावत रखते हुए वरिष्ठ सहायक अध्यापक को सरप्लस किया गया, जबकि अन्य जिलों में प्रधानाध्यापक को ही अधिशेष घोषित कर दिया गया। समान परिस्थितियों में अलग-अलग निर्णय लिए जाने से शिक्षकों के बीच असमानता की भावना बढ़ी है।

समायोजन प्रक्रिया में शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के प्रावधानों और शिक्षक-छात्र अनुपात का समान रूप से पालन नहीं किए जाने की शिकायत भी सामने आई है। इसके साथ ही विद्यालयों की वास्तविक विषयवार आवश्यकता (Subject Mapping) को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने की बात कही जा रही है। शिक्षकों का मानना है कि केवल संख्या के आधार पर समायोजन करने से कई विद्यालयों में विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी हो सकती है, जिसका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ेगा।

जूनियर हाई स्कूलों में समान विषय के शिक्षकों के बीच सरप्लस निर्धारण में वरिष्ठता के सिद्धांत का भी सभी जनपदों में समान रूप से पालन नहीं होने का आरोप लगाया गया है। वहीं छात्र संख्या के निर्धारण के लिए 30 अप्रैल की स्थिति को आधार बनाए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिक्षकों का कहना है कि यदि अद्यतन एवं वास्तविक छात्र संख्या के आधार पर समायोजन किया जाए तो अधिक न्यायसंगत परिणाम सामने आएंगे।

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समायोजन और पदोन्नति की नीतियों में भी विरोधाभास होने की बात सामने आई है। शिक्षकों के अनुसार पदोन्नति प्रक्रिया में 150 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का पद शून्य माना जाता है, जबकि समायोजन प्रक्रिया में उसी पद को कार्यरत मानकर गणना की गई है। इस प्रकार की नीतिगत असंगति को दूर करने की आवश्यकता बताई जा रही है।

इसके अतिरिक्त शिक्षकों ने यह भी मांग की है कि यदि कोई शिक्षक स्वेच्छा से समायोजन कराना चाहता है तो उसकी लिखित सहमति को प्राथमिकता दी जाए। उनका मानना है कि इससे अनावश्यक विवाद कम होंगे और समायोजन प्रक्रिया अधिक सुगम एवं पारदर्शी बन सकेगी।

शिक्षकों की प्रमुख मांग है कि पूरे प्रदेश में समायोजन प्रक्रिया को एक समान मानकों, RTE नियमों, विषयवार आवश्यकता (Subject Mapping), वरिष्ठता तथा पारदर्शी एवं न्यायसंगत सिद्धांतों के आधार पर पुनः निर्धारित किया जाए, ताकि सभी शिक्षकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित हो सके और भविष्य में इस प्रकार के विवादों से बचा जा सके।

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