बेसिक शिक्षा विभाग में सरप्लस शिक्षकों के अंतःजनपदीय (जिले के अंदर) तबादले और समायोजन का मामला लगातार उलझता जा रहा है। यह पूरा प्रकरण पहले से ही हाई कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट लगातार पूरे प्रदेश में समान नीति लागू करने के कड़े निर्देश दे रहा है, लेकिन इसके बावजूद अलग-अलग जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) वरिष्ठता सूची तैयार करने में अपने-अपने नियम थोप रहे हैं। अब ताजा मामला छात्र-शिक्षक अनुपात और हेडमास्टरों के समायोजन में बरती जा रही भारी विसंगतियों का सामने आया है।
छात्र-शिक्षक अनुपात की तारीखों में मनमानी
हाई कोर्ट के निर्देश पर सभी जिलों में सरप्लस शिक्षकों की वरिष्ठता सूची तैयार की जा रही है, लेकिन इसके मानकों में बड़ा 'खेल' देखने को मिल रहा है। जिलों में अनुपात तय करने के लिए अलग-अलग कट-ऑफ डेट मानी जा रही है। उदाहरण के लिए, ललितपुर जिले में वरिष्ठता सूची तैयार करने के लिए 20 मई की छात्र संख्या को आधार बनाया गया है। वहीं, औरैया जिले में इसके लिए 30 अप्रैल की छात्र संख्या के आधार पर अनुपात तय किया जा रहा है। इस पर शिक्षकों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। शिक्षकों का तर्क है कि अप्रैल से लेकर जुलाई तक प्रदेश भर में 'स्कूल चलो अभियान' कई चरणों में चलता है। इस दौरान स्कूलों में लगातार नए दाखिले होते हैं, जिससे छात्र संख्या बढ़ती है और छात्र-शिक्षक अनुपात स्वाभाविक रूप से बदल जाता है। ऐसे में पूरे प्रदेश के लिए एक ही 'कट-ऑफ डेट' तय होनी चाहिए, ताकि किसी भी शिक्षक के साथ अन्याय न हो।
हेडमास्टर के समायोजन पर भी जिलों में भारी विरोधाभास
केवल सहायक अध्यापकों के मामले में ही नहीं, बल्कि प्रधानाध्यापकों (हेडमास्टर) को सरप्लस मानने के नियमों में भी जिलों के बीच कोई एकरूपता नहीं है। एक तरफ जहाँ झांसी जिले में 150 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में हेडमास्टर को सरप्लस मानकर उनका तबादला किया जा रहा है, तो वहीं इसके ठीक विपरीत बाराबंकी सहित कई अन्य जिलों में 150 से कम छात्र संख्या होने पर भी हेडमास्टरों को सरप्लस नहीं माना जा रहा है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि अधिकारी शासन के नियमों की अपने-अपने हिसाब से व्याख्या कर रहे हैं।
सीनियर-जूनियर के विवाद में शासन कर चुका है स्थिति साफ
इससे पहले बेसिक शिक्षा विभाग के तबादलों में सीनियर और जूनियर शिक्षकों को लेकर भी हर जिले में अलग नियम लागू हो रहे थे। कहीं जूनियर का तबादला किया जा रहा था तो कहीं सीनियर का। भारी विवाद के बाद जब शिक्षक कोर्ट की शरण में गए, तब जाकर शासन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए सख्त निर्देश दिए कि हमेशा सीनियर शिक्षक ही सरप्लस माने जाएंगे। कोर्ट ने अब पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी जिलों से वरिष्ठता सूची भी तलब कर ली है।
शिक्षक संगठनों की मांग और अधिकारियों की चुप्पी
तबादलों में हो रहे इस खेल पर प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष विनय कुमार सिंह का स्पष्ट कहना है कि स्कूल में एक भी छात्र की संख्या घटने या बढ़ने से शिक्षक के तबादले और अनुपात पर गहरा असर पड़ता है। उनकी मांग है कि पूरे प्रदेश में बिना किसी भेदभाव के समान मानक तय किए जाने चाहिए। दूसरी ओर, इस पूरे मामले पर विभागीय अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है। बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव सुरेंद्र तिवारी ने इस पर कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि चूंकि पूरा मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए इस पर कोई भी विभागीय टिप्पणी करना अभी उचित नहीं होगा।


