सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अधिकारियों की मामूली गलती के लिए कर्मचारियों से नहीं छीन सकते नौकरी
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने नौकरीपेशा लोगों के हित में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि भर्ती प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों से कोई मामूली प्रक्रियात्मक या तकनीकी त्रुटि हुई है, तो उसे आधार बनाकर लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि अधिकारियों की चूक का खामियाजा उन कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए, जिनकी अपनी कोई गलती नहीं है।
यह पूरा विवाद हरियाणा की एक सहकारी संस्था की वर्ष 2014 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। इस संस्था में क्लर्क, सेल्समैन, चपरासी और चौकीदार के पदों पर नियुक्तियां की गई थीं। बाद में यह आरोप लगाते हुए इन नियुक्तियों को रद्द कर दिया गया कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों का भारी उल्लंघन हुआ है, जिसमें चयन प्रक्रिया के दौरान कुछ अधिकारियों की अनुपस्थिति भी शामिल थी। इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी नियुक्तियां रद्द करने के फैसले को सही ठहराते हुए बरकरार रखा था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह पलटते हुए प्रभावित कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला देते हुए सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों की भर्ती प्रक्रिया पर कई महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट कीं। अदालत ने निष्पक्षता और तकनीकी खामी में अंतर समझाते हुए कहा कि भर्ती में निष्पक्ष विज्ञापन, पारदर्शिता और सभी योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर मिलना अनिवार्य है। यदि पदों का विज्ञापन ही नहीं निकाला गया होता और लोगों को मौका नहीं मिलता, तो वह एक गंभीर त्रुटि होती। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई मूलभूत दोष नहीं था।
कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि जिन कर्मचारियों ने वर्षों तक बिना किसी आरोप के अपनी सेवाएं दी हैं, उन्हें सिर्फ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता क्योंकि भर्ती करने वाले अधिकारियों से कोई तकनीकी चूक हो गई थी। महज कुछ अधिकारियों की अनुपस्थिति या छोटी प्रक्रियात्मक कमियों को आधार बनाकर पूरी चयन प्रक्रिया को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत के सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित सहकारी संस्था को इस पूरे मामले को जल्द से जल्द सुलझाने के निर्देश दिए हैं। संस्था को आदेश दिया गया है कि वह एक महीने के भीतर अपने 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' की बैठक बुलाए और इन नियुक्तियों की दोबारा गहन समीक्षा करे। अदालत ने यह भी तय किया है कि यदि चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति मेरिट यानी योग्यता के आधार पर हुई थी, तो उन्हें तुरंत पुनर्नियुक्त किया जाए। इसके साथ ही उनकी पूर्व सेवा की वरिष्ठता (Seniority) और अन्य लाभ भी बहाल किए जाने चाहिए।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को उस अवधि का वेतन और भत्ते नहीं दिए जाएंगे, जितने समय वे अपनी सेवा से बाहर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि पुरानी भर्ती विज्ञापन या चयन प्रक्रिया को नए सिरे से दोबारा नहीं खोला जाएगा।
फैसले का व्यापक असर
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सरकारी, अर्ध-सरकारी और सहकारी संस्थाओं में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए एक बड़े सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा। यह ऐतिहासिक फैसला इस सिद्धांत को मजबूती देता है कि यदि कोई कर्मचारी अपनी योग्यता से चुना गया है और भर्ती प्रक्रिया मूल रूप से पारदर्शी रही है, तो विभागीय अधिकारियों की छोटी-मोटी गलतियों का दंड किसी भी सूरत में कर्मचारी की बर्ख़ास्तगी के रूप में नहीं दिया जा सकता।


