Type Here to Get Search Results !
ADVERTISEMENT

TET अनिवार्यता मामला: सुप्रीम कोर्ट ने TET अनिवार्यता पर फैसला सुरक्षित रखा, पुराने शिक्षकों की सेवा पर संकट?

Sir Ji Ki Pathshala

TET अनिवार्यता मामला: सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक सुनवाई और 14 लाख शिक्षकों का भविष्य

​भारत की शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्तापूर्ण सुधार लाने के उद्देश्य से 'निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' (RTE Act) लागू किया गया था। इस अधिनियम ने प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 'शिक्षक पात्रता परीक्षा' (TET) को एक अनिवार्य मानक के रूप में स्थापित किया। हालांकि, इस अनिवार्यता के लागू होने के समय और पूर्व से कार्यरत शिक्षकों पर इसके प्रभाव को लेकर कानूनी विवादों का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ। हाल ही में सिविल अपील संख्या 1385/2025 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध दाखिल रिव्यू याचिकाओं पर सुनवाई पूरी हो गई है और न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि देशभर के लाखों शिक्षकों के करियर का निर्णायक बिंदु साबित होगा।

Supreme Court hearing on TET mandatory case review petition

​मामले की पृष्ठभूमि: विवाद की जड़ कहाँ है?

​RTE अधिनियम 2009 के प्रभावी होने के बाद, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने 23 अगस्त 2010 को एक राजपत्र (Gazette Notification) जारी किया। इसमें स्पष्ट किया गया कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा।

​विवाद तब उत्पन्न हुआ जब सरकार ने इस नियम को उन शिक्षकों पर भी लागू करना शुरू किया जो इस अधिनियम के आने से पहले ही सेवा में थे। विशेष रूप से, 2017 में संसद द्वारा किए गए संशोधन ने एक नई समय-सीमा निर्धारित की, जिसमें कहा गया कि 31 मार्च 2015 तक नियुक्त और कार्यरत सभी शिक्षकों को 31 मार्च 2019 तक अनिवार्य रूप से TET उत्तीर्ण करना होगा। ऐसा न करने की स्थिति में उनकी सेवाओं को अवैध माना जाने लगा।

​सुप्रीम कोर्ट में हालिया सुनवाई के मुख्य अंश

​रिव्यू याचिकाओं पर हुई सुनवाई के दौरान देश के शीर्ष संवैधानिक विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने शिक्षकों का पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से तीन पक्षों पर गहन मंथन हुआ:

​1. 23 अगस्त 2010 के राजपत्र की व्याख्या

​शिक्षकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने यह तर्क दिया कि जब 2010 में पहली बार अधिसूचना जारी हुई थी, तब उसमें 'पूर्व से कार्यरत' (In-service) शिक्षकों को इस अनिवार्यता से छूट दी गई थी। अधिवक्ताओं का कहना है कि शिक्षकों ने वर्षों तक इसी आधार पर अपनी सेवाएं दीं और विभाग ने भी उनकी नियुक्ति को वैध माना। ऐसे में, सालों बाद किसी नए संशोधन को पिछली तारीख से लागू करना 'प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस' (प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत) के खिलाफ है।

​2. राज्य सरकारों का दोहरा रुख

​सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों की सरकारों का रुख चर्चा का विषय रहा। याचियों के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार नहीं किया कि 2017 का संशोधन पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू नहीं होता। सरकारों की ओर से कोई ऐसा ठोस तथ्य भी नहीं रखा गया जो उन पुराने शिक्षकों को राहत दिला सके जो अब अपनी सेवानिवृत्ति के करीब हैं।

​3. माननीय न्यायालय की गंभीर टिप्पणी

​सुनवाई के दौरान पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाया। न्यायालय ने पूछा कि जब 2017 में संसद ने अधिनियम में संशोधन किया था, तब उस समय इसे चुनौती क्यों नहीं दी गई? इस प्रश्न के जवाब में अधिवक्ताओं ने कहा कि कई राज्यों ने उस समय कोई स्पष्ट शासनादेश जारी नहीं किया था, जिससे शिक्षकों के बीच भ्रम की स्थिति बनी रही। जब उनकी सेवाओं पर संकट आया, तब वे न्यायालय की शरण में आए।

​कानूनी और संवैधानिक पेच

​यह मामला दो संवैधानिक सिद्धांतों के बीच टकराव जैसा है:

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार: सरकार का तर्क है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए शिक्षकों का योग्य (TET उत्तीर्ण) होना अनिवार्य है।

सेवा सुरक्षा का अधिकार: शिक्षकों का तर्क है कि चूंकि उनकी नियुक्ति तत्कालीन नियमों के अनुसार वैध थी, इसलिए बाद में आए नियमों के आधार पर उनकी आजीविका नहीं छीनी जा सकती।

​विभिन्न राज्यों पर प्रभाव

​यह मामला केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारतीय राज्यों में भी हजारों ऐसे शिक्षक हैं जिनकी नियुक्ति 2010 से पहले की है। यदि सुप्रीम कोर्ट रिव्यू याचिकाओं को खारिज कर देता है, तो इन सभी शिक्षकों की नौकरी पर तलवार लटक जाएगी। वहीं, यदि न्यायालय 'पूर्व प्रभाव' (Retrospective effect) को गलत मानता है, तो लाखों पुराने शिक्षकों को सेवा विस्तार और सेवानिवृत्ति लाभों की सुरक्षा मिल जाएगी।

​शिक्षक संगठनों की भूमिका

​सुनवाई के दौरान टी.एफ.आई. (TFI) और अन्य संगठनों के प्रतिनिधि, जैसे डॉ. दिनेश चन्द्र शर्मा और संजय सिंह, सक्रिय रहे। इन संगठनों का तर्क है कि जो शिक्षक 15-20 वर्षों से पढ़ा रहे हैं, उनके पास अनुभव की कमी नहीं है। उन्हें केवल एक परीक्षा के आधार पर अयोग्य घोषित करना न केवल उनके साथ अन्याय है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के अनुभवजन्य ढांचे को भी कमजोर करेगा।

​निष्कर्ष: फैसले का इंतजार

​सुप्रीम कोर्ट ने लंबी और विस्तृत सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब आने वाला निर्णय यह तय करेगा कि क्या 2017 का संशोधन "अंतिम सत्य" है या 2010 के मूल राजपत्र की भावना को प्राथमिकता दी जाएगी।

​पूरे देश की निगाहें अब माननीय न्यायालय के उस लिखित आदेश पर हैं, जो यह स्पष्ट करेगा कि क्या 'अनुभव' और 'पुरानी नियुक्ति' को 'TET की डिग्री' पर वरीयता मिलेगी या नहीं। यह फैसला भारतीय शैक्षिक न्यायशास्त्र (Educational Jurisprudence) में एक मिसाल बनेगा।

​नोट: यह लेख वर्तमान में उपलब्ध कानूनी जानकारी और सुनवाई के दौरान हुई टिप्पणियों पर आधारित है। अंतिम निर्णय माननीय सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।

Top Post Ad

ADVERTISEMENT

Bottom Post Ad

ADVERTISEMENT