रिव्यू में जाने वाले सभी संबंधित पक्षों के लिए एक विशेष विश्लेषण
किसी भी कानूनी विवाद का समाधान तब तक संभव नहीं है, जब तक उसकी जड़ तक न पहुँचा जाए। वर्तमान में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर जो भ्रम की स्थिति बनी हुई है, वह केवल एक नियम का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कानून की गलत व्याख्या और समय-सीमा के घालमेल का परिणाम है। रिव्यू पिटीशन की तैयारी कर रहे पक्षों को यह समझना होगा कि समस्या की असली जड़ कहाँ है।
1. RTE संशोधन 2017 और 31 मार्च 2015 की समय-सीमा
दस्तावेजों के अनुसार, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) की धारा 23(2) में किए गए संशोधनों को गहराई से पढ़ना अनिवार्य है। RTE संशोधन अधिनियम 2017 के बाद, धारा 23(2) के तहत केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई थी कि वह उन राज्यों में जहाँ पर्याप्त प्रशिक्षण संस्थान नहीं हैं, शिक्षक नियुक्ति के लिए न्यूनतम अर्हताओं में शिथिलता (छूट) दे सके।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बिंदु 31 मार्च 2015 की तारीख है। कानूनन, इस शिथिलता के आधार पर अंतिम नियुक्ति केवल इसी तिथि तक हो सकती थी। इसके बाद नियुक्त होने वाले प्रत्येक शिक्षक के लिए न्यूनतम अर्हता अनिवार्य थी। समस्या तब शुरू हुई जब इस 'छूट' की अवधि और 'अनिवार्यता' के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया। 2017 के संशोधन ने उन शिक्षकों को 31 मार्च 2019 तक का समय दिया था जो नियुक्त तो थे, लेकिन अर्हता पूर्ण नहीं करते थे। लेकिन क्या यह नियम उन पर भी लागू होता है जो पहले से प्रशिक्षित थे? यहीं से विवाद की जड़ फूटती है।
2. NCTE के हलफनामे में छिपी 'तकनीकी चूक'
दस्तावेजों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि NCTE (राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद) ने माननीय न्यायालय के समक्ष दाखिल अपने हलफनामे में एक बड़ी विसंगति पैदा की है। हलफनामे के बिंदु 1 से 12 तक तो तथ्यात्मक जानकारी दी गई है, लेकिन असली समस्या बिंदू संख्या 13 में है।
NCTE ने सलाह दी कि चाहे कोई शिक्षक 2001 से पहले नियुक्त हुआ हो, या 2001-2010 के बीच, या फिर 2010-2011 के दौरान—सभी के लिए नियुक्ति और पदोन्नति में TET अनिवार्य होगा। यह व्याख्या तर्कों के विपरीत प्रतीत होती है। NCTE का खुद का 23 अगस्त 2010 का पैरा 4 यह कहता था कि जो अप्रशिक्षित हैं, उन्हें प्रशिक्षण लेना होगा। लेकिन बाद में इस प्रशिक्षण की अनिवार्यता को चुपके से 'TET' की अनिवार्यता के साथ जोड़ दिया गया, वह भी उन शिक्षकों के लिए जो पहले से ही पूर्णतः प्रशिक्षित (Pre-trained) और सेवारत थे।
3. प्रशिक्षित बनाम अप्रशिक्षित: समानता का गलत सिद्धांत
कानून का एक मूलभूत सिद्धांत है कि समान लोगों के साथ समान व्यवहार हो, लेकिन असमानों को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। NCTE की सलाह की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसने 'पूर्व-प्रशिक्षित शिक्षकों' और 'अप्रशिक्षित शिक्षकों' के बीच के अंतर को समाप्त कर दिया।
- पूर्व-प्रशिक्षित शिक्षक: वे जिनके पास नियुक्ति के समय ही बीएड (B.Ed.) या बीटीसी (BTC) जैसी सभी आवश्यक व्यावसायिक योग्यताएं थीं।
- अप्रशिक्षित शिक्षक: वे जिन्हें विशेष परिस्थितियों में बिना योग्यता के नियुक्त किया गया और जिन्हें बाद में अर्हता हासिल करने की छूट दी गई।
RTE अधिनियम की मूल भावना उन लोगों को अर्हता प्राप्त करने के लिए बाध्य करना था जो अयोग्य थे। लेकिन व्याख्या ऐसी की गई जैसे कि जो पहले से योग्य और अनुभवी हैं, उन्हें भी नए सिरे से पात्रता सिद्ध करनी होगी।
4. रिव्यू पिटीशन के लिए विचारणीय प्रश्न
रिव्यू में जाने वाले पक्षों को कोर्ट के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि:
- क्या एक प्रशासनिक सलाह (NCTE का हलफनामा) मूल अधिनियम (RTE Act) की सीमाओं से बाहर जा सकती है?
- यदि 2017 का संशोधन केवल 31 मार्च 2015 तक नियुक्त 'अर्हता विहीन' शिक्षकों के लिए था, तो इसे 'संपूर्ण शिक्षक' वर्ग पर कैसे लागू किया जा सकता है?
- क्या पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect) से नियमों को लागू करके वरिष्ठ शिक्षकों के अधिकारों का हनन किया जा सकता है?
निष्कर्ष: समाधान का मार्ग
TET विवाद का निदान केवल तारीखों की बहस में नहीं, बल्कि इस स्पष्टीकरण में है कि 'न्यूनतम अर्हता' का अर्थ उन लोगों के लिए क्या है जो पहले से ही प्रशिक्षित थे। NCTE द्वारा दी गई गलत सलाह ने एक ऐसा कानूनी भंवर पैदा कर दिया है जिसमें हजारों शिक्षकों का भविष्य फँसा है। रिव्यू पिटीशन के माध्यम से यह स्पष्ट करना होगा कि 2017 का संशोधन प्रशिक्षण की कमी को पूरा करने के लिए था, न कि पहले से योग्य शिक्षकों पर नए प्रतिबंध लगाने के लिए।
जब तक इस 'असली जड़' (बिंदु 13 की गलत व्याख्या) को न्यायालय के संज्ञान में नहीं लाया जाएगा, तब तक न्याय की उम्मीद अधूरी रहेगी। सभी संबंधित पक्षों को एकजुट होकर इस तकनीकी विसंगति पर चोट करनी चाहिए।


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