बीते एक दशक में भारतीय सरकारी शिक्षा तंत्र ने एक बड़ा भौतिक बदलाव देखा है। 'कायाकल्प' जैसी योजनाओं और करोड़ों के बजट से स्कूल की इमारतें अब निजी स्कूलों को टक्कर दे रही हैं। टाइल्स लगे फर्श, रंग-बिरंगे स्मार्ट क्लास और आधुनिक डेस्क-बेंच एक प्रगतिशील राष्ट्र की तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन इस चकाचौंध के बीच एक कड़वी सच्चाई यह है कि जिस 'शिक्षक' को इस व्यवस्था की आत्मा होना चाहिए था, वह आज केवल एक 'डेटा एंट्री ऑपरेटर' और 'सरकारी इवेंट मैनेजर' बनकर रह गया है।
हम अक्सर गर्व से कहते हैं कि "शिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है," लेकिन हकीकत में हमने उस निर्माता के हाथों से कलम छीनकर उसे अंतहीन रजिस्टरों और मोबाइल एप्स की जंजीरों में जकड़ दिया है। यह लेख उन अदृश्य बेड़ियों की पड़ताल है जो एक शिक्षक की रचनात्मकता और उसके सम्मान का गला घोंट रही हैं।
गैर-शैक्षणिक कार्यों का मकड़जाल: 'शिक्षण' अब एक गौण कार्य
एक सरकारी शिक्षक के वार्षिक कैलेंडर को देखें, तो 'पढ़ाना' उसकी सूची में सबसे नीचे नजर आता है। प्रशासन ने शिक्षक को एक 'ऑल-इन-वन' संसाधन समझ लिया है, जिसे कहीं भी फिट किया जा सकता है।
👉 बीएलओ (BLO) ड्यूटी और चुनावी चक्की:
वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना, मृतकों के नाम काटना और घर-घर जाकर सत्यापन करना—यह कार्य अब साल भर चलता है। एक शिक्षक अपनी गर्मियों की छुट्टियाँ और रविवार इसी काम में बिता देता है। जब वह मानसिक रूप से थका हुआ कक्षा में लौटता है, तो उसके भीतर वह ऊर्जा नहीं बचती जो एक प्रेरणादायी शिक्षक के लिए अनिवार्य है।
👉 पशु गणना से लेकर शौचालय की पहरेदारी तक
यह व्यवस्था की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है कि एक उच्च शिक्षित शिक्षक को गाँव के कुत्तों, गायों और भैंसों की गिनती में लगाया जाता है। इससे भी भयावह 'लोटा पार्टी' जैसे अभियान रहे हैं, जहाँ शिक्षकों को सुबह 4 बजे खेतों की मेड़ पर खड़ा किया गया ताकि वे लोगों को खुले में शौच से रोक सकें। क्या एक गुरु की गरिमा इसी अपमानजनक कार्य के लिए है?
👉 शराब तस्करों की मुखबिरी और सुरक्षा जोखिम
कुछ राज्यों में शिक्षकों को शराब तस्करों की निगरानी करने का आदेश दिया गया। यह न केवल उनके पेशे का अपमान है, बल्कि उनकी जान को जोखिम में डालने जैसा है। अपराधी तत्वों से लोहा लेना पुलिस का काम है, न कि उस शिक्षक का जिसे अगले दिन कक्षा में बच्चों को नैतिकता पढ़ानी है।
'मिड-डे मील' (MDM): एक रसोईघर में तब्दील होता विद्यालय
सरकारी स्कूलों में भोजन की व्यवस्था एक सराहनीय कदम है, लेकिन इसका क्रियान्वयन शिक्षक की बलि देकर किया जा रहा है।
- कैटरी मैनेजर की भूमिका: आज शिक्षक का आधा समय राशन के उठाव, तेल-मसाले के हिसाब, रसोइयों के मानदेय और खाने की गुणवत्ता की जांच में बीतता है।
- भ्रष्टाचार और जवाबदेही का डर: यदि खाने में एक तिनका भी मिल जाए, तो प्रशासन और मीडिया सीधे शिक्षक को अपराधी बना देते हैं। इस तनाव के बीच एक शिक्षक 'न्यूटन के नियम' समझाएगा या 'नमक-मिर्च का स्टॉक' चेक करेगा?
'डिजिटल इंडिया' की मार: मानसिक प्रताड़ना का जरिया
तकनीक को शिक्षक का मददगार होना चाहिए था, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में यह मानसिक प्रताड़ना का जरिया बन गई है।
👉 सेल्फी और जीपीएस हाजिरी:
शिक्षक की ईमानदारी पर प्रशासन का संदेह इतना गहरा है कि उसे दिन में तीन बार अलग-अलग एप्स पर सेल्फी अपलोड करनी पड़ती है। कई बार नेटवर्क न होने के कारण शिक्षक मोबाइल हाथ में लेकर ऊँचे स्थानों या छतों पर दौड़ता नजर आता है। क्या एक राष्ट्र निर्माता के साथ ऐसा व्यवहार उचित है?
👉पोर्टल की बाढ़:
वर्तमान में 'ई-शिक्षाकोष', 'यू-डायस' और 'प्रेरणा पोर्टल' जैसे डिजिटल माध्यमों की बहुलता ने शिक्षकों की भूमिका को सीमित कर दिया है। छात्रों के आधार डेटा, डीबीटी (DBT) और अन्य भारी-भरकम डेटा फीडिंग का कार्य, जो कि मूलतः कार्यालय सहायकों या लिपिकों का है, सीधे शिक्षकों पर थोप दिया गया है। इस 'डिजिटल क्लर्क' की भूमिका के कारण शिक्षकों की ऊर्जा और समय का बड़ा हिस्सा गैर-शैक्षणिक कार्यों में व्यय हो रहा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और छात्र-शिक्षक संवाद प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। ये सब लिपिकीय (Clerical) कार्य हैं, जिन्हें जबरन शिक्षक पर थोपा गया है।
'निरीक्षण' या 'मानसिक उत्पीड़न'?
जब कोई प्रशासनिक अधिकारी स्कूल आता है, तो उसका उद्देश्य यह देखना नहीं होता कि बच्चों का अधिगम स्तर (Learning Level) क्या है। उनका पूरा ध्यान रजिस्टरों की कटिंग, लाल स्याही के उपयोग और एमडीएम के स्टॉक पर होता है।
अधिकारियों का अभद्र व्यवहार शिक्षकों के आत्मसम्मान को छलनी कर देता है। जब छात्रों के सामने एक गुरु को 'सस्पेंड' करने की धमकी दी जाती है, तो उसी क्षण बच्चों के मन से शिक्षक का सम्मान खत्म हो जाता है। भय आधारित व्यवस्था कभी भी उत्कृष्ट परिणाम नहीं दे सकती।
संसाधनों का अकाल बनाम कॉर्पोरेट अपेक्षाएं
एक तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है, जहाँ एक ही शिक्षक पाँच कक्षाओं को एक साथ पढ़ा रहा है (Multi-grade teaching)। दूसरी तरफ, सरकार चाहती है कि ये शिक्षक उन निजी स्कूलों का मुकाबला करें जहाँ हर विषय का अलग विशेषज्ञ और आधुनिक लैब है।
अक्सर बिजली कटौती और इंटरनेट के अभाव में भी शिक्षकों से 'स्मार्ट क्लास' की रिपोर्ट माँगी जाती है। जब संसाधन शून्य हों और अपेक्षाएं हिमालय जैसी, तो शिक्षक केवल 'कागजी खानापूर्ति' करने को मजबूर हो जाता है।
समाधान की पुकार: शिक्षक को शिक्षक रहने दीजिए!
यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि सरकारी स्कूल 'सच्चे बदलाव' के केंद्र बनें, तो हमें निम्नलिखित क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे:
- गैर-शिक्षण कार्यों से पूर्ण मुक्ति: चुनाव, जनगणना और सर्वेक्षणों के लिए अलग से 'प्रशासनिक सहायकों' की भर्ती की जाए। शिक्षक की कलम केवल ब्लैकबोर्ड के लिए होनी चाहिए।
- लिपिक (Clerk) की नियुक्ति: हर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल में कम से कम एक क्लर्क हो, जो एमडीएम, डेटा एंट्री और पोर्टल का काम संभाले।
- शिक्षक गरिमा कानून: कार्यस्थल पर शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान हो।
- परिणाम आधारित स्वायत्तता: शिक्षक को पाठ्यक्रम पूरा करने की 'मशीन' न समझा जाए, बल्कि उसे पढ़ाने के नए तरीके खोजने की आजादी दी जाए।
निष्कर्ष: नींव को मत भूलिए
ईंट, पत्थर और टाइल्स से चमकती इमारतें केवल एक ढांचा हैं। शिक्षा का वास्तविक मंदिर तब बनता है जब वहाँ एक संतुष्ट, सम्मानित और तनावमुक्त शिक्षक खड़ा हो। यदि हम अपने शिक्षकों को फाइलों, शराब तस्करों की निगरानी और राशन के हिसाब में उलझाए रखेंगे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं।
हमें याद रखना होगा कि जिस दिन राष्ट्र का शिक्षक व्यवस्था से हार जाएगा, उस दिन राष्ट्र के पतन की शुरुआत हो जाएगी। "साहब, स्कूल तो आपने 'स्मार्ट' बना दिए, अब जरा शिक्षक को भी 'सम्मान' दे दीजिए, ताकि वह इन इमारतों के भीतर 'इंसान' गढ़ सके।"
शिक्षक का सम्मान = राष्ट्र का उत्थान


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