पदोन्नति में TET की अनिवार्यता: विधिक व्याख्या या अधिसूचनाओं का विरोधाभास?
प्रस्तावना बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों की पदोन्नति का मामला लंबे समय से विवादों में है। इस विवाद का मुख्य कारण राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा समय-समय पर जारी अधिसूचनाओं की अधूरी और त्रुटिपूर्ण व्याख्या है। विशेष रूप से, 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को पदोन्नति में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से छूट प्राप्त है या नहीं, यह प्रश्न कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
23 अगस्त 2010 की आधारभूत अधिसूचना और 'छूट' का प्रावधान
NCTE ने 23 अगस्त 2010 को एक ऐतिहासिक अधिसूचना जारी की, जिसने कक्षा 1 से 8 तक के शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताएं निर्धारित कीं। इसी अधिसूचना में पहली बार TET को अनिवार्य किया गया।
हालांकि, इस अधिसूचना के बिंदु संख्या 4 में स्पष्ट रूप से 'प्रोटेक्शन' (संरक्षण) दिया गया:
- इसमें कहा गया कि इस अधिसूचना की तिथि से पूर्व नियुक्त शिक्षक, जो तत्कालीन नियमों (जैसे 2001 के विनियम) के अनुसार नियुक्त हुए थे, उन्हें नई निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं (TET आदि) हासिल करने की आवश्यकता नहीं है।
- विधिक तर्क: यह छूट केवल नौकरी बचाने के लिए नहीं, बल्कि सेवा की निरंतरता के लिए दी गई थी। यदि कोई शिक्षक नियुक्ति के समय वैध था, तो उसे सेवा के अगले लाभों (जैसे पदोन्नति) के लिए नए सिरे से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
12 नवंबर 2014 की अधिसूचना: भ्रम की स्थिति
पदोन्नति में विवाद का असली सूत्रपात 12 नवंबर 2014 की अधिसूचना के बिंदु 4 (ख) से होता है। इसमें कहा गया है कि:
"अध्यापकों की एक स्तर से दूसरे स्तर पर पदोन्नति के लिए पहली और दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट संगत न्यूनतम अर्हताएं लागू होंगी।"
विभाग का एक वर्ग इसकी व्याख्या इस प्रकार करता है कि 'न्यूनतम अर्हता' का अर्थ TET है, अतः पदोन्नति के लिए TET अनिवार्य है। लेकिन इसी अधिसूचना की अनुसूची पर ध्यान दें तो वह पुनः 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना का ही हवाला देती है। चूँकि 2010 की अधिसूचना पुराने शिक्षकों को छूट (Exemption) देती है, तो 2014 की अधिसूचना भी स्वतः ही उस छूट को समाहित करती है।
माननीय उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप (ओमप्रकाश त्रिपाठी वाद)
विधिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए याचिका संख्या 22454/2018 (ओमप्रकाश त्रिपाठी बनाम सचिव बेसिक शिक्षा) का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है। माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि:
- जो शिक्षक 2010 से पहले नियुक्त हैं, वे NCTE के मानकों के अनुसार 'अर्ह' माने जाएंगे।
- पदोन्नति के समय नई शर्तों को उन पर थोपना जो उनके सेवा नियमों (Service Rules) का मूल हिस्सा नहीं थीं, अनुचित है।
- सेवा नियमावली में पदोन्नति के लिए अनुभव और योग्यता के जो मानक नियुक्ति के समय थे, उन्हीं का विस्तार होना चाहिए।
विसंगति के प्रमुख बिंदु
वर्तमान में हो रही व्याख्या में निम्नलिखित त्रुटियां दिखाई देती हैं:
- अधूरा अध्ययन: अधिकारी 2014 की अधिसूचना के केवल एक बिंदु को पढ़ते हैं, जबकि उसके साथ संलग्न 'अनुसूची' और 2010 की मूल अधिसूचना के बिंदु 4 एवं 5 की अनदेखी कर दी जाती है।
- कैडर का अधिकार: पदोन्नति एक सेवा लाभ है। यदि नियुक्ति के समय शिक्षक स्नातक और बी.एड./बी.टी.सी. के आधार पर नियुक्त हुआ था, तो उसी कैडर में पदोन्नति के लिए उसे नई पात्रता परीक्षा के लिए विवश करना उसके सेवा अधिकारों का हनन है।
- समानता का अभाव: देश के विभिन्न राज्यों में 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को बिना TET के पदोन्नति दी जा रही है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इसे बाधित किया गया है।
निष्कर्ष और समाधान
पदोन्नति की विसंगति को दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि शासन 12 नवंबर 2014 की अधिसूचना को 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना के संदर्भ में 'होलिस्टिक' (समग्र) रूप से देखे।
मुख्य मांग और तर्क:
- 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को NCTE की अधिसूचना के बिंदु 4 के तहत प्राप्त छूट को पदोन्नति में भी लागू माना जाए।
- पदोन्नति की प्रक्रिया में केवल उन्हीं शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य किया जाए जिनकी नियुक्ति 23 अगस्त 2010 के बाद हुई है।
- उच्च न्यायालय के आदेशों का अनुपालन करते हुए पदोन्नति की रुकी हुई प्रक्रिया को तत्काल शुरू किया जाए।
यदि सरकार और विभाग इन विधिक बारीकियों को स्वीकार करते हैं, तो न केवल मुकदमों का बोझ कम होगा, बल्कि दशकों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों को उनका जायज हक भी मिल सकेगा।


