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MP शिक्षक TET अनिवार्यता मामला: सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ठोस पैरवी, क्या बच जाएगी 70,000 शिक्षकों की नौकरी?

Sir Ji Ki Pathshala

MP शिक्षक TET अनिवार्यता: सुप्रीम कोर्ट में सरकार की 'Review Petition' और 70,000 शिक्षकों का भविष्य

MP Government Review Petition in Supreme Court regarding TET

भोपाल/नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग और लगभग 70,000 सेवारत शिक्षकों के लिए एक बड़ी कानूनी उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1 सितंबर 2025 को दिए गए उस फैसले के खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार ने मोर्चा खोल दिया है, जिसमें सेवारत शिक्षकों (In-service Teachers) के लिए भी TET (शिक्षक पात्रता परीक्षा) को अनिवार्य कर दिया गया था। सरकार ने पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल कर कोर्ट के सामने कई ऐसे तथ्य रखे हैं, जो इस पूरे मामले की दिशा बदल सकते हैं।

​पूरे विवाद की पृष्ठभूमि

​सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में शिक्षकों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था। कोर्ट का कहना था कि जिन शिक्षकों की सेवा 5 वर्ष से अधिक बची है, उन्हें 2 साल के भीतर TET पास करना होगा, अन्यथा उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) दी जा सकती है। इसी आदेश ने प्रदेश के हजारों अनुभवी शिक्षकों की रातों की नींद उड़ा दी थी।

​सरकार की दलीलों के 5 'ब्रह्मास्त्र'

​मध्य प्रदेश सरकार ने अपनी याचिका में जो तर्क दिए हैं, वे न केवल कानूनी रूप से मजबूत हैं, बल्कि 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांत पर भी आधारित हैं:

1. "हमें सुना ही नहीं गया" (Violation of Natural Justice)

सरकार का सबसे प्राथमिक तर्क यह है कि जब इस मामले की सुनवाई चल रही थी, तब मध्य प्रदेश सरकार इस केस में पक्षकार (Party) नहीं थी। राज्य के नियम, कानून और जमीनी हकीकत कोर्ट के सामने रखी ही नहीं गई, जो कि न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

2. NCTE नोटिफिकेशन (23.08.2010) का पैरा 4

सरकार ने कोर्ट का ध्यान NCTE के मूल नोटिफिकेशन की ओर खींचा है। इसके पैरा 4 में स्पष्ट उल्लेख है कि जो शिक्षक पहले से नौकरी में हैं, उन्हें TET पास करने की आवश्यकता नहीं है। सरकार का तर्क है कि TET केवल नई नियुक्तियों के लिए एक 'प्रवेश द्वार' था, न कि पुराने शिक्षकों के लिए 'सेवा की शर्त'।

3. RTE एक्ट की व्याख्या में त्रुटि

याचिका में कहा गया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) 2009 में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि सेवारत शिक्षकों को अपनी नौकरी बचाने के लिए पात्रता परीक्षा देनी होगी। कोर्ट ने कानून की व्याख्या करने में 'अधूरी जानकारी' का सहारा लिया है।

4. ट्रेनिंग और पात्रता के बीच का अंतर

2017 के संशोधन का हवाला देते हुए सरकार ने स्पष्ट किया कि उस संशोधन का उद्देश्य 'अप्रशिक्षित' (Untrained) शिक्षकों को 'प्रशिक्षित' (Training) करना था, न कि उन पर नई शैक्षणिक योग्यता (TET) थोपना। ट्रेनिंग और पात्रता परीक्षा दो अलग-अलग विषय हैं।

5. संघीय ढांचा (Federal Structure) और अधिकार

शिक्षा समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है। राज्य सरकार का तर्क है कि उनके सेवा नियम पहले से प्रभावी हैं और केंद्र का कोई भी कानून बिना उचित प्रक्रिया के राज्य के नियमों को 'ओवरराइड' नहीं कर सकता।

​70,000 परिवारों पर संकट

​अगर सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला कायम रहता है, तो अकेले मध्य प्रदेश में लगभग 70,000 शिक्षक प्रभावित होंगे। इससे न केवल उनकी नौकरी पर खतरा मंडराएगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा शून्य पैदा हो जाएगा। प्रमोशन रुकने और सामाजिक-मानसिक तनाव की स्थिति अलग है।

​मध्य प्रदेश सरकार की मांगें

​मध्य प्रदेश सरकार ने कोर्ट से केवल फैसले पर पुनर्विचार की मांग नहीं की है, बल्कि 'ओपन कोर्ट हियरिंग' (खुली अदालत में सुनवाई) की भी अपील की है। सरकार चाहती है कि:

  • ​01.09.2025 के फैसले के उस हिस्से को हटाया जाए जो पुराने शिक्षकों पर TET थोपता है।
  • ​मध्य प्रदेश सरकार को आधिकारिक तौर पर पक्षकार बनाया जाए।

निष्कर्ष:

मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम उन शिक्षकों के लिए संजीवनी जैसा है जो दशकों से विभाग को अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। यदि कोर्ट 'Error apparent on record' (रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि) को स्वीकार करता है, तो यह देश भर के लाखों इन-सर्विस शिक्षकों के लिए एक ऐतिहासिक जीत होगी।