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देश के सभी बच्चों और किशोरों की होगी डायबिटीज जांच, जानें सरकार की नई गाइडलाइन

Sir Ji Ki Pathshala

नई दिल्ली: देश में बच्चों और किशोरों में बढ़ते मधुमेह के खतरों को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय लिया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बीमारियों की जल्द पहचान और समय पर उपचार सुनिश्चित करने के लिए नए दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) जारी किए हैं। इसके तहत अब देश के 0 से 18 साल तक के सभी बच्चों और किशोरों की मधुमेह जांच अनिवार्य रूप से की जाएगी।

​मुख्य बिंदु: जांच से लेकर उपचार तक सब कुछ मुफ्त

​सरकार ने इस कार्यक्रम को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए हैं:

  • नि:शुल्क सुविधाएं: जांच, निदान (Diagnosis) और उपचार की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पूरी तरह मुफ्त होगी। इसका उद्देश्य गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर वित्तीय बोझ को कम करना है।
  • जांच का माध्यम: यह स्क्रीनिंग मुख्य रूप से स्कूलों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से की जाएगी।
  • एकीकृत स्वास्थ्य प्रणाली: संदिग्ध मामलों की पुष्टि के लिए बच्चों को जिला स्तरीय स्वास्थ्य केंद्रों या मेडिकल कॉलेजों में रेफर किया जाएगा, ताकि उन्हें विशेषज्ञों की देखरेख में उन्नत उपचार मिल सके।
  • व्यापक कवरेज: मधुमेह के साथ-साथ अब बच्चों में उच्च रक्तचाप (Hypertension) और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं की भी जांच की जाएगी।

​क्यों पड़ी इसकी जरूरत? (खतरे के आंकड़े)

​स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा साझा किए गए आंकड़े बताते हैं कि भारत में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां युवाओं को तेजी से अपनी चपेट में ले रही हैं:

  1. बढ़ती दर: देश की लगभग 16% वयस्क आबादी मधुमेह या प्री-मधुमेह की स्थिति में है।
  2. किशोरों पर असर: 10-19 वर्ष की आयु के 12.3% लड़के और 8.4% लड़कियां पहले से ही मधुमेह से ग्रस्त हैं।
  3. मोटापा: 'राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वेक्षण-5' के अनुसार, 5 साल से कम उम्र के 3.4% बच्चे मोटापे का शिकार हैं, जो मधुमेह का सबसे बड़ा जोखिम कारक है।
  4. वैश्विक स्थिति: चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश है जहां मधुमेह रोगियों की संख्या सबसे अधिक है (लगभग 10 करोड़ रोगी)।

​बीमारी बढ़ने के मुख्य कारण

​विशेषज्ञों और शोध के अनुसार, बच्चों में इस बीमारी के बढ़ने के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं:

  • जंक फूड: खान-पान में असंतुलन और प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन।
  • शारीरिक निष्क्रियता: खेलकूद की कमी और स्क्रीन टाइम (मोबाइल/टीवी) का बढ़ना।
  • मानसिक तनाव: पढ़ाई और प्रतिस्पर्धा के कारण बढ़ता तनाव।
मंत्रालय का संदेश: इस पहल के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों और किशोरों में गैर-संचारी रोगों (NCDs) की सक्रिय रूप से पहचान और प्रबंधन कर रहे हैं।

भारत में बच्चों की मधुमेह जांच के लिए ग्लूकोमीटर का उपयोग

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