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पेंशन और ग्रेच्युटी कर्मचारी का अधिकार, उपहार नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन और ग्रेच्युटी कर्मचारी द्वारा दी गई लंबी सेवा का प्रतिफल है। न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि यह कोई उपहार या इनाम नहीं है जिसे सरकार अपनी मर्जी से रोक सके, बल्कि यह कर्मचारी का अर्जित अधिकार है जो उसके बुढ़ापे और सामाजिक सुरक्षा का आधार बनता है। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने सेवानिवृत्त कांस्टेबल देवेंद्र सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की और राज्य सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त की।

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​मामले के तथ्यों के अनुसार, याची देवेंद्र सिंह वर्ष 1984 में पुलिस विभाग में नियुक्त हुए थे और मई 2025 में सेवानिवृत्त हुए। विभाग ने उनकी सेवानिवृत्ति के समय उनके देयकों में से साढ़े पांच लाख रुपये से अधिक की राशि यह कहते हुए काट ली कि उन्हें सेवाकाल के दौरान अधिक भुगतान किया गया था। कोर्ट ने इस कटौती को प्रथम दृष्टया अवैध मानते हुए इसे तुरंत निरस्त करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि विभाग की अपनी गलती के कारण कर्मचारी को अधिक भुगतान हुआ है, तो सेवानिवृत्ति के बाद उसकी वसूली करना सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।

​सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि सरकार को अपने कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण और समान व्यवहार करना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार कुछ मामलों में लाभ देती है और उन्हीं परिस्थितियों वाले अन्य मामलों में विरोध करती है, जो पूरी तरह भेदभावपूर्ण है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका का दायरा अत्यंत सीमित होता है और जब तक मूल आदेश में कोई स्पष्ट त्रुटि न हो, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

​इस मामले में उत्तरदायी अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए कोर्ट ने आगरा के पुलिस कमिश्नर और डीसीपी से स्पष्टीकरण मांगा है कि उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। साथ ही, प्रमुख सचिव (गृह) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया गया है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हितों के संरक्षण के लिए शासन स्तर पर क्या कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित की गई है, जिसमें संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया गया है।

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