इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: दो महीने के भीतर शिक्षकों की वरिष्ठता सूची तैयार करने का निर्देश
प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में उच्च प्राथमिक विद्यालयों (Junior High Schools) के सहायक अध्यापकों की वरिष्ठता और पदोन्नति को लेकर एक दूरगामी परिणाम वाला आदेश दिया है। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने नीरज कुमार सिंह एवं 14 अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि वरिष्ठता सूची तैयार करने में विधिक नियमों और योग्यता के मानकों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
न्यायालय ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA), बलिया को निर्देश दिया है कि वे शिक्षकों की आपत्तियों का निस्तारण करते हुए दो महीने के भीतर अंतिम आदेश पारित करें।
मुख्य बिंदु: पदोन्नति और वरिष्ठता का नया आधार
- TET की अनिवार्यता: याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग है कि वरिष्ठता सूची में TET (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाया जाए।
- समय सीमा: कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के दो महीने के भीतर पूरा करने का सख्त निर्देश दिया है।
- सुनवाई का मौका: विभाग को कोई भी निर्णय लेने से पहले संबंधित शिक्षकों का पक्ष सुनना होगा।
- सकारण आदेश: BSA को केवल आवेदन स्वीकार या खारिज नहीं करना है, बल्कि कानून के दायरे में तर्कसंगत लिखित आदेश जारी करना होगा।
## 1 सितंबर 2025 का निर्णय: उच्च प्राथमिक में 'TET' अब अनिवार्य मानक
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 1 सितंबर 2025 का न्यायिक निर्णय और NCTE के दिशा-निर्देश हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि:
- कानूनी बाध्यता: 1 सितंबर 2025 के निर्णय के अनुसार, उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पदोन्नति और वरिष्ठता तय करने के लिए TET उत्तीर्ण होना एक अनिवार्य शर्त है।
- सूची का नया प्रारूप: विभाग द्वारा तैयार की जा रही वरिष्ठता सूची में इस निर्णय का अनुपालन होना चाहिए। बिना TET की स्थिति स्पष्ट किए बनाई गई कोई भी सूची विधिक रूप से शून्य मानी जाएगी।
- उच्चतम न्यायालय का आधार: यह मांग माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सिविल अपील संख्या 1385/2025 और हाईकोर्ट की स्पेशल अपील संख्या 652/2024 के अनुरूप है, जो शिक्षकों की योग्यता और वरिष्ठता के बीच सीधा संबंध स्थापित करती है।
मामले की पृष्ठभूमि और शिक्षकों की मांग
बलिया जिले के जूनियर हाईस्कूलों में कार्यरत सहायक अध्यापकों ने कोर्ट में Mandamus (परमादेश) की मांग की थी। उनका कहना था कि विभाग द्वारा जारी अस्थायी (Tentative) वरिष्ठता सूची में विसंगतियां हैं और उनकी आपत्तियां (Annexure 10) लंबे समय से लंबित हैं। शिक्षकों का आरोप है कि विभाग पुराने ढर्रे पर सूची बना रहा है, जबकि नवीनतम न्यायिक निर्णयों ने नियमों में बदलाव कर दिया है।
इस आदेश का व्यापक प्रभाव
यह आदेश केवल बलिया जिले के शिक्षकों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा ढांचे के लिए एक नजीर है:
- पारदर्शिता: अब वरिष्ठता सूची केवल सेवा अवधि (Seniority by Age/Joining) पर नहीं, बल्कि विधिक योग्यता (TET) पर भी आधारित होगी।
- जवाबदेही: दो महीने की समय सीमा से विभाग की लेटलतीफी खत्म होगी और पदोन्नति की प्रक्रिया में तेजी आएगी।
- विवादों का अंत: यदि विभाग 1 सितंबर 2025 के निर्णय के अनुसार सूची अपडेट करता है, तो भविष्य में होने वाली कानूनी पेचीदगियां कम होंगी।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि शिक्षकों के सेवा संबंधी लाभ केवल प्रशासनिक मर्जी पर निर्भर नहीं हैं। 1 सितंबर 2025 के निर्णय के प्रकाश में TET की अनिवार्यता को लागू करना अब विभाग की जिम्मेदारी है।




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