शिक्षा व्यवस्था का अंतर्विरोध और नैतिकता की कसौटी
लोकतंत्र में शिक्षा किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार स्तंभ होती है, लेकिन जब इस स्तंभ की नींव यानी 'सरकारी शिक्षा व्यवस्था' पर सवाल उठते हैं, तो समाधान ढूंढने के बजाय अक्सर 'नैतिक नसीहतों' का सहारा लिया जाता है। हाल ही में उपमुख्यमंत्री द्वारा शिक्षकों को दी गई यह नसीहत—कि जब शिक्षकों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तभी जनता का भरोसा जागेगा—महज एक सुझाव नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक विफलता का परोक्ष स्वीकारनामा है जिसे दशकों से नजरअंदाज किया गया है।
यह विमर्श केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे 'कथनी और करनी के द्वंद्व' को उजागर करता है जो हमारी नीति-निर्माण प्रक्रिया में व्याप्त है। एक ओर हम विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखते हैं, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं से जूझते स्कूलों और गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ तले दबे शिक्षकों से 'त्याग और नैतिकता' की अपेक्षा करते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या किसी व्यवस्था की साख बचाना केवल उस पदक्रम के अंतिम व्यक्ति (शिक्षक) की जिम्मेदारी है? क्या यह मांग उन नीति-निर्धारकों, उच्चाधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों पर लागू नहीं होनी चाहिए जो बजट आवंटित करने और नीतियां बनाने की शक्ति रखते हैं?
प्रस्तुत लेख में हम इसी नैतिक दोहरे मापदंड, संवैधानिक अधिकारों और सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत का विश्लेषण करेंगे। हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि शिक्षा में सुधार 'भावनात्मक अपीलों' से आएगा या फिर एक सुदृढ़ 'ढांचागत परिवर्तन' से।
उपमुख्यमंत्री द्वारा शिक्षकों को दी गई यह नसीहत वास्तव में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जिसे सुधारने की जिम्मेदारी स्वयं सरकार की है। यह बयान एक साथ कई सवाल खड़े करता है।
1. व्यवस्था की विफलता का ठीकरा शिक्षकों पर?
जब सरकार के प्रतिनिधि यह कहते हैं कि शिक्षकों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ेंगे तभी जनता का भरोसा बढ़ेगा, तो वे परोक्ष रूप से यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि वर्तमान व्यवस्था अभी भरोसे के लायक नहीं है। सवाल यह है कि यदि बुनियादी सुविधाएँ, सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सरकार सुनिश्चित कर दे, तो किसी को भी नसीहत देने की आवश्यकता क्यों पड़ेगी? क्या विश्वास बहाली की जिम्मेदारी केवल शिक्षकों की है, नीति-निर्माताओं की नहीं?
2. केवल शिक्षक ही क्यों?
यह मांग अक्सर शिक्षकों से की जाती है, लेकिन इसमें नेताओं, आईएएस अधिकारियों और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को शामिल क्यों नहीं किया जाता?
- यदि जिले का जिलाधिकारी या स्वयं उपमुख्यमंत्री का परिवार सरकारी स्कूल को नहीं चुनता, तो केवल एक प्राथमिक शिक्षक से यह उम्मीद करना "नैतिकता का दोहरा मापदंड" प्रतीत होता है।
- विश्वास तब अधिक मजबूत होगा जब नीति बनाने वाले और बजट आवंटित करने वाले लोग उस व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे।
3. 'सुविधा बनाम गुणवत्ता' का भ्रम
सरकार अक्सर 'कायाकल्प' के तहत रंग-रोगन और भवनों के सुधार को ही बड़ी उपलब्धि मान लेती है। लेकिन शिक्षा केवल दीवारों से नहीं, बल्कि पर्याप्त शिक्षकों, समय पर मिलने वाली पाठ्यपुस्तकों और गैर-शैक्षणिक कार्यों (जैसे जनगणना, चुनाव ड्यूटी) से मुक्ति पर निर्भर करती है। जब तक शिक्षकों को बाबू या क्लर्क की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, तब तक वे स्वयं अपने बच्चों के भविष्य को लेकर आशंकित रहेंगे।
4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपने बच्चों के लिए सर्वोत्तम विकल्प चुने। किसी विशेष पेशे से जुड़े होने के कारण किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इस तरह का नैतिक दबाव बनाना तर्कसंगत नहीं है। क्या हम किसी सरकारी डॉक्टर को मजबूर कर सकते हैं कि वह अपना इलाज केवल सरकारी अस्पताल में ही कराए, भले ही वहाँ वेंटिलेटर न हो?
5. आत्मविश्वास की कमी या जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना?
इस तरह के बयान अक्सर असली मुद्दों—जैसे शिक्षकों के खाली पद, पुरानी पेंशन योजना (OPS) और स्कूलों में संसाधनों की कमी—से ध्यान भटकाने का काम करते हैं। शिक्षा के स्तर को सुधारना एक ढांचागत प्रक्रिया है, न कि केवल एक भावनात्मक अपील।
निष्कर्ष
उपमुख्यमंत्री का सुझाव सकारात्मक हो सकता है, लेकिन यह 'घोड़े से पहले गाड़ी' (Cart before the horse) रखने जैसा है। विश्वास तब पैदा होता है जब परिणाम दिखते हैं। यदि सरकार वास्तव में चाहती है कि शिक्षक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजें, तो उसे पहले सरकारी स्कूलों को इतना सक्षम बनाना होगा कि वे निजी स्कूलों को गुणवत्ता के आधार पर चुनौती दे सकें। सम्मान और विश्वास नसीहतों से नहीं, व्यवस्था की मजबूती से आता है।


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