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क्या संविधान उस भक्त की रक्षा नहीं करेगा जिसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं? - सुप्रीम कोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

धर्म, परंपरा और संविधान: सबरीमाला विवाद और सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

Supreme Court of India Sabarimala Hearing News

आस्था और अधिकार का टकराव

​भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धर्म और संविधान के बीच का संतुलन हमेशा से एक संवेदनशील विषय रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के समक्ष सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान एक ऐसा प्रश्न उठा, जिसने देश के कानूनी और सामाजिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। यह बहस केवल एक मंदिर की परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बुनियादी सवाल पर टिकी है कि आधुनिक लोकतंत्र में 'पुरानी प्रथाएं' बड़ी हैं या 'मानवीय गरिमा और बराबरी का अधिकार'।

अदालत का वह सवाल, जिसने सबको सोचने पर मजबूर किया

​सबरीमाला अयप्पा मंदिर के मुख्य पुजारी (तंत्री) की ओर से पेश हुए वकीलों से जजों ने अत्यंत गंभीर सवाल पूछे। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की टिप्पणियों ने इस मामले को एक नया मानवीय दृष्टिकोण दिया। उन्होंने पूछा:

"क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा, जिसे केवल उसके जन्म या उसकी स्थिति के आधार पर अपने आराध्य की मूर्ति को छूने की अनुमति नहीं दी जाती?"

​जस्टिस अमानुल्लाह का तर्क था कि जब कोई भक्त पूरी श्रद्धा के साथ, मन में बिना किसी छल या अशुद्धि के अपने 'सृष्टिकर्ता' के पास जाता है, तो समाज या धर्म के पहरेदार उसे यह कहकर कैसे रोक सकते हैं कि उसकी 'वंश' या 'शारीरिक स्थिति' उसे ईश्वर को स्पर्श करने के अयोग्य बनाती है? अदालत ने साफ़ तौर पर यह संकेत दिया कि क्या एक लोकतांत्रिक देश में परंपराओं की बेड़ियाँ इतनी मजबूत हो सकती हैं कि वे किसी व्यक्ति की भक्ति और उसकी गरिमा के बीच दीवार बन जाएं।

मंदिर पक्ष का तर्क: देवता की अपनी स्वायत्तता

​दूसरी ओर, सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी के वकील वी. गिरी ने इस मामले को 'देवता के अधिकारों' और 'अनुष्ठानों की शुद्धता' से जोड़कर देखा। उनके तर्कों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:

  1. नैष्ठिक ब्रह्मचर्य: भगवान अयप्पा को सबरीमाला में एक 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' के रूप में पूजा जाता है। मंदिर पक्ष का कहना है कि यह केवल एक नियम नहीं, बल्कि देवता का चरित्र है।
  2. परंपरा की अनिवार्यता: वकील ने दलील दी कि जब कोई भक्त किसी विशेष मंदिर में जाता है, तो उसे उस देवता की 'विशिष्ट विशेषताओं' को स्वीकार करना चाहिए। उनके अनुसार, यदि भक्त की अपनी श्रद्धा है, तो उसे उस मंदिर के नियमों का भी सम्मान करना होगा जो सदियों से चले आ रहे हैं।
  3. धार्मिक हस्तक्षेप: पुजारी पक्ष का मानना है कि अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत राज्य हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन जहाँ मामला देवता की अपनी प्रकृति और सदियों पुराने तांत्रिक अनुष्ठानों का हो, वहाँ न्यायपालिका को एक सीमा तय करनी चाहिए।

संविधान और समानता की कसौटी

​सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) के बीच तालमेल बिठाना है।

  • अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून के सामने सब बराबर हैं।
  • अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसकी प्रथाओं का पालन करने की आजादी देता है।

​लेकिन, कोर्ट का प्रश्न यह है कि क्या धार्मिक आजादी के नाम पर 'भेदभाव' को कानूनी मान्यता दी जा सकती है? अगर कोई प्रथा महिलाओं को उनकी जैविक स्थिति के कारण अछूत या अशुद्ध मानती है, तो क्या वह संविधान की मूल भावना के खिलाफ नहीं है?

एक व्यापक संदर्भ: केवल एक मंदिर नहीं, पूरे समाज का प्रश्न

​यह मामला केवल सबरीमाला का नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इस समय उन तमाम याचिकाओं पर विचार कर रहा है जो मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकारों और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित प्रथाओं से जुड़ी हैं। अदालत यह तय करना चाहती है कि क्या 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' (Essential Religious Practice) के नाम पर संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का ऐतिहासिक स्पष्टीकरण

​इसी समाचार रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण न्यायिक विकास का जिक्र है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत का संविधान लागू होने के बाद, किसी भी ऐसी पुरानी परंपरा (Customary Law) को मान्यता नहीं दी जा सकती जो महिलाओं को संपत्ति के अधिकार से वंचित करती हो।

​जस्टिस निधि गुप्ता की अदालत ने कहा कि उत्तराधिकार के मामले में महिला और पुरुष के बीच भेदभाव करना असंवैधानिक है। यह फैसला सबरीमाला मामले के समानांतर ही चलता है, क्योंकि दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है— 'पितृसत्तात्मक परंपराओं पर संवैधानिक समानता की जीत।'

निष्कर्ष: बदलाव की दहलीज पर खड़ा समाज

​सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ यह साफ करती हैं कि न्यायपालिका अब धर्म के उन बंद दरवाजों को खोलने की दिशा में बढ़ रही है, जहाँ 'पवित्रता' के नाम पर भेदभाव को जायज ठहराया जाता रहा है।

​अदालत का यह कहना कि 'सृष्टिकर्ता और उसकी रचना के बीच कोई अंतर नहीं हो सकता', भारत के भविष्य की न्याय व्यवस्था की एक झलक है। यह एक ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा है जहाँ धर्म और आस्था का पालन तो होगा, लेकिन वह किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाकर या किसी को 'दोयम दर्जे' का नागरिक मानकर नहीं होगा।

अंतिम शब्द:

भक्ति निजी होती है और ईश्वर सबके लिए समान है। यदि संविधान देश के सर्वोच्च कानून के रूप में हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का हक देता है, तो वह हक मंदिर की दहलीज पर खत्म नहीं होना चाहिए। सबरीमाला पर आने वाला फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए यह मिसाल पेश करेगा कि परंपराएं बदल सकती हैं, लेकिन न्याय और समानता अटल हैं।

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