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धोखाधड़ी के प्रमाण के बिना दशकों पुरानी नियुक्ति रद्द करना अवैध: इलाहाबाद हाई कोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के संरक्षण में एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी ने दशकों तक विभाग को अपनी सेवा दी है, तो बिना किसी पुख्ता सबूत या धोखाधड़ी के प्रमाण के उसकी नियुक्ति को इतने लंबे समय बाद रद्द करना पूरी तरह से अवैध और न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

Allahabad High Court building image

मामला क्या था?

​यह मामला गौतमबुद्ध नगर के जेवर स्थित कंपोजिट विद्यालय में कार्यरत हेडमास्टर मुकेश कुमार शर्मा से जुड़ा है। बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) ने 11 दिसंबर 2025 को एक आदेश जारी कर मुकेश कुमार की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। बर्खास्तगी का आधार यह बताया गया कि उन्होंने शैक्षणिक सत्र 1993-94 में एक साथ दो नियमित पाठ्यक्रम (शारीरिक शिक्षा प्रमाणपत्र और इंटरमीडिएट) पूरे किए थे और इस तथ्य को छिपाया था।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

​न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने मुकेश कुमार शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए BSA के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  • प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: कोर्ट ने पाया कि बर्खास्तगी की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। कर्मचारी के खिलाफ न तो कोई आरोप पत्र (Charge Sheet) तैयार किया गया और न ही साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। महज एक नोटिस के आधार पर सेवा समाप्त करना 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' का सीधा उल्लंघन है।
  • दशकों की निष्कलंक सेवा: अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि याची पिछले तीन दशकों से सेवा में था। बिना किसी धोखाधड़ी के ठोस सबूत के, इतनी लंबी अवधि के बाद सेवा समाप्त करना मनमाना और दोषपूर्ण है।
  • प्रमाणपत्रों की वैधता: कोर्ट ने कहा कि याची के हाईस्कूल (1991), शारीरिक शिक्षा (1993-94) और इंटरमीडिएट (1995) के प्रमाणपत्र आज भी वैध हैं। जब तक सक्षम प्राधिकारी इन प्रमाणपत्रों को रद्द या अवैध घोषित नहीं करते, तब तक इन्हें प्रभावी माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

​हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी संदर्भ दिया। अदालत ने विभाग के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि एक ही वर्ष में दो परीक्षाएं उत्तीर्ण करना नियुक्ति को अवैध बनाता है। कोर्ट के अनुसार, यदि नियुक्ति के समय कोई जालसाजी साबित नहीं होती है, तो दशकों बाद पुराने तकनीकी आधारों पर किसी का करियर खत्म नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

​अदालत ने बीएसए के बर्खास्तगी आदेश को 'मनमाना और दोषपूर्ण' करार देते हुए रद्द कर दिया और याची की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया। यह फैसला उन हजारों सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत है, जिन्हें वर्षों की सेवा के बाद तकनीकी कारणों या पुरानी शिकायतों के आधार पर सेवा से हटाने की धमकी दी जाती है।

मुख्य बिंदु एक नज़र में:

  • न्यायालय: इलाहाबाद हाई कोर्ट (एकलपीठ: न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान)
  • याची: मुकेश कुमार शर्मा (हेडमास्टर, जेवर)
  • कोर्ट का फैसला: तीन दशक की सेवा के बाद बिना धोखाधड़ी के प्रमाण के बर्खास्तगी अवैध।
  • सीख: विभागीय जांच में नियमों (जैसे यूपी सरकारी सेवक नियमावली, 1999) का पालन करना अनिवार्य है।