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शिक्षा की राह में रोड़ा बनती माहवारी: जागरूकता की कमी से 2.3% लड़कियां छोड़ रहीं स्कूल

Sir Ji Ki Pathshala

लखनऊ। महिला स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में आज भी 'माहवारी' (Menstruation) एक ऐसी चुनौती बनी हुई है, जो किशोरियों के भविष्य को प्रभावित कर रही है। हाल ही में लखनऊ के गोमतीनगर में आयोजित 'माहवारी स्वच्छता प्रबंधन' कार्यशाला में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के सर्वे के अनुसार, माहवारी शुरू होने के बाद देश में लगभग 2.3 प्रतिशत लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं।

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अज्ञानता और झिझक: एक बड़ी बाधा

​रिपोर्ट के मुताबिक, समाज में जागरूकता की भारी कमी है। आंकड़े बताते हैं कि:

  • 60% लड़कियां अपनी पहली माहवारी के बारे में पहले से बिल्कुल अनजान रहती हैं, जिससे उनमें डर और असुरक्षा का भाव पैदा होता है।
  • ​लगभग 54% लड़कियों को इस विषय पर प्राथमिक जानकारी अपनी माँ से मिलती है।
  • ​करीब 27% महिलाएं आज भी सुरक्षित सैनिटरी पैड का उपयोग नहीं कर पाती हैं।

सालाना 60 दिन की पढ़ाई का नुकसान

​माध्यमिक शिक्षा विभाग की संयुक्त निदेशक सांत्वना तिवारी ने एक गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि माहवारी के दौरान उचित सुविधाओं और जानकारी के अभाव में छात्राएं स्कूल से अनुपस्थित रहती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वजह से लड़कियों की सालाना लगभग 60 दिन की पढ़ाई प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर उनके आत्मविश्वास और शैक्षणिक प्रदर्शन पर पड़ता है।

सरकार और प्रशासन की पहल

​कार्यक्रम में मुख्य अतिथि, माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गुलाब देवी ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान पर ज़ोर देते हुए अभिभावकों से अपील की। उन्होंने कहा:

"माताओं को अपनी बेटियों के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए ताकि वे अपनी समस्याओं को साझा करने में न हिचकें। समाज में अभी भी इस विषय पर जागरूकता की आवश्यकता है।"

​वहीं, महानिदेशक स्कूल शिक्षा मोनिका रानी ने स्कूलों में बेहतर शौचालय और स्वच्छता सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जब तक माहवारी से जुड़ी झिझक नहीं टूटेगी, तब तक बेटियां बिना डर के अपनी शिक्षा जारी नहीं रख सकेंगी।

भविष्य की योजना

​शिक्षा विभाग अब स्कूलों में 'माहवारी स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर' विकसित करने पर काम कर रहा है। बड़ौत और सुल्तानपुर के कुछ विद्यालयों को मॉडल के रूप में पेश किया गया है, जहाँ छात्राओं को जागरूक करने के साथ-साथ आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

निष्कर्ष: माहवारी कोई शर्म का विषय नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यदि हम अपनी बेटियों को सही जानकारी और सुरक्षित वातावरण दें, तो उनकी शिक्षा की उड़ान को रुकने से बचाया जा सकता है।