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शिक्षकों के तबादले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख, शिक्षकों के समायोजन में पारदर्शिता और RTE का पालन अनिवार्य

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 'सरप्लस' (अतिशेष) शिक्षकों के समायोजन और तबादलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि स्थानांतरण की प्रक्रिया डेटा पर आधारित और पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि तबादला कोई सजा नहीं है, बल्कि यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया है जिसका आधार केवल छात्रों का हित होना चाहिए।

Allahabad HC teachers transfer Decision: शिक्षकों के समायोजन में पारदर्शिता और RTE का पालन अनिवार्य

शिक्षा का अधिकार (RTE) ही प्राथमिकता

​न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सौरभ कुमार सिंह व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि तबादलों का एकमात्र उद्देश्य शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) का सही कार्यान्वयन सुनिश्चित करना होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि किसी भी शिक्षक का स्थानांतरण मनमाना या भेदभावपूर्ण नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें:

  • कम से कम दो शिक्षक अनिवार्य: कोर्ट ने निर्देश दिया है कि समायोजन प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित किया जाए कि हर स्कूल में कम से कम दो शिक्षक जरूर मौजूद हों, ताकि शिक्षण कार्य बाधित न हो।
  • यथास्थिति का पालन: जिन विद्यालयों में पहले से ही दो या उससे अधिक शिक्षक तैनात हैं, वहां फिलहाल किसी भी तरह की छेड़छाड़ या नए स्थानांतरण न करने का सुझाव दिया गया है।
  • डेटा की शुद्धता पर सवाल: शिक्षकों द्वारा यू-डायस (U-DISE) पोर्टल के डेटा में विसंगतियों की शिकायतों को कोर्ट ने गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने कहा कि विभाग अविश्वसनीय डेटा के आधार पर सूचियां तैयार न करे।

त्रुटिपूर्ण डेटा से शिक्षकों में था डर

​अपीलकर्ताओं का तर्क था कि जिस पोर्टल के जरिए सरप्लस शिक्षकों की पहचान की जा रही है, उसमें भारी गलतियां हैं। इससे कई ऐसे शिक्षकों का भी तबादला होने का खतरा पैदा हो गया था, जहां वास्तव में शिक्षक कम थे। हाईकोर्ट ने अब राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए ताकि किसी भी शिक्षक के साथ अन्याय न हो।

निष्कर्ष: पारदर्शिता ही समाधान

​अदालत के इस फैसले से प्रदेश के हजारों शिक्षकों को बड़ी राहत मिली है। अब शिक्षा विभाग को शिक्षकों के संतुलन और आरटीई मानकों का पालन करने के साथ-साथ डेटा की विश्वसनीयता भी साबित करनी होगी। यह फैसला साफ करता है कि प्रशासनिक सुधारों के नाम पर शिक्षकों का उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं होगा।

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