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RTE दाखिला: 'ऑनलाइन आवेदन की अनिवार्यता न्यायसंगत नहीं', इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत प्रवेश प्रक्रिया को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के भविष्य को केवल तकनीकी आधार पर संकट में नहीं डाला जा सकता। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने अपने आदेश में कहा कि RTE के तहत दाखिले के लिए अभिभावकों को केवल ऑनलाइन आवेदन के लिए विवश करना पूरी तरह से अनुचित है।

RTE Admission process Highcourt Direction

​तकनीकी बाधाएं नहीं बनेंगी शिक्षा में रोड़ा

​अदालत ने यह टिप्पणी याची ख्वाजा शमशाद अहमद की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याची ने तकनीकी दिक्कतों के कारण अपने बच्चे के नर्सरी प्रवेश के लिए ऑफलाइन (मैनुअल) आवेदन दिया था। जिसे बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA), प्रयागराज ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि विभाग केवल ऑनलाइन आवेदन ही स्वीकार करता है।

​कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

​मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय न्यायालय ने कहा:

​"यदि कोई अभिभावक किन्हीं अपरिहार्य कारणों या तकनीकी समस्याओं की वजह से ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग करने में सक्षम नहीं है, तो संबंधित अधिकारी का यह विधिक दायित्व है कि वह उनका मैनुअल आवेदन स्वीकार करे और उसे विभागीय प्रक्रिया में शामिल करना सुनिश्चित करे।"

​फैसले का मुख्य सार:

  • समान अवसर: ऑनलाइन आवेदन की सुविधा न होने पर किसी बच्चे को दाखिले से वंचित करना असंवैधानिक है।
  • अधिकारियों की जिम्मेदारी: यदि पोर्टल काम नहीं कर रहा है, तो विभाग को वैकल्पिक (ऑफलाइन) व्यवस्था उपलब्ध करानी होगी।
  • अधिकार की सुरक्षा: तकनीक मौलिक अधिकारों के कार्यान्वयन में सहायक होनी चाहिए, न कि बाधा।

​यह फैसला उत्तर प्रदेश के उन हजारों गरीब परिवारों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जो डिजिटल संसाधनों की कमी या सर्वर की समस्याओं के कारण अपने बच्चों का नामांकन नहीं करा पा रहे थे।

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