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'पत्नी नौकरानी नहीं, जीवन-साथी है': सुप्रीम कोर्ट की पति को दो टूक

Sir Ji Ki Pathshala

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद के एक मामले की सुनवाई करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रगतिशील टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घर का काम न करना या खाना न बनाना किसी भी सूरत में 'क्रूरता' (Cruelty) की श्रेणी में नहीं आता।

मामले की मुख्य बातें

​एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें उसका तर्क था कि उसकी पत्नी घर के कामकाज ठीक से नहीं करती और खाना नहीं बनाती। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए पति को कड़ी फटकार लगाई।

Supreme Court verdict on wife responsibilities and household chores

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • बदलता समय और सोच: जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि समय अब बदल चुका है। पुरुष प्रधान सोच को पीछे छोड़ते हुए पतियों को यह समझना होगा कि घर के कामों में हाथ बंटाना उनकी भी जिम्मेदारी है।
  • नौकरानी बनाम जीवनसाथी: जस्टिस संदीप मेहता ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "आपने किसी नौकरानी से शादी नहीं की है, बल्कि एक जीवनसाथी (Partner) से की है।" जीवनसाथी का अर्थ ही साझा जिम्मेदारी और सहयोग है।
  • साझा भूमिका: पीठ ने जोर देकर कहा कि अगर पत्नी किसी कारणवश घर का काम नहीं कर पा रही है, तो पति को भी रसोई और अन्य कार्यों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

सामाजिक प्रभाव

​सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन पुराने सामाजिक मानदंडों पर करारी चोट है जहाँ घर के सारे कामों का बोझ केवल महिलाओं पर डाल दिया जाता था। अदालत ने इस आदेश के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया है कि:

  1. ​घरेलू कामकाज केवल महिला की जिम्मेदारी नहीं है।
  2. ​वैवाहिक जीवन में एक-दूसरे का सम्मान और सहयोग प्राथमिक है।
  3. ​छोटी-मोटी घरेलू शिकायतों को 'मानसिक क्रूरता' बताकर तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।

निष्कर्ष: यह टिप्पणी देश में महिला अधिकारों और वैवाहिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विवाह दो व्यक्तियों का समान जुड़ाव है, न कि किसी एक पक्ष द्वारा दूसरे की सेवा करना।

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