उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए शासन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। लखनऊ से जारी आदेश के अनुसार, एडेड विद्यालयों के शिक्षकों को अब प्रबंधन तंत्र के उत्पीड़न से घबराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इंटरमीडिएट एक्ट की उप धारा-3(क) उनकी सेवा सुरक्षा के लिए सबसे मजबूत ढाल के रूप में कार्य करेगी। शासन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नए शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियमों में सेवा सुरक्षा के अलग प्रावधान की मांग पूरी तरह से औचित्यहीन है क्योंकि मौजूदा कानून पहले से ही शिक्षकों को पूर्ण संरक्षण प्रदान करता है।
इस महत्वपूर्ण आदेश के माध्यम से यह साफ कर दिया गया है कि कोई भी विद्यालय प्रबंधन जिला विद्यालय निरीक्षक यानी डीआईओएस के पूर्व अनुमोदन या अनुमति के बिना किसी भी शिक्षक के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही शुरू नहीं कर सकता है। कानून का यह सुरक्षा घेरा इतना व्यापक है कि प्रबंधन न तो किसी शिक्षक को पद से हटा सकता है, न उसकी सेवा समाप्त कर सकता है और न ही उसे किसी प्रकार का आधिकारिक नोटिस जारी कर सकता है। शासन ने सभी जिलों के डीआईओएस को सख्त निर्देश दिए हैं कि इस धारा का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि इसे दरकिनार करना किसी भी स्तर पर संभव नहीं होगा।
इसके साथ ही शासन ने जिला विद्यालय निरीक्षकों की जवाबदेही भी तय की है। आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि यदि डीआईओएस किसी मामले को जानबूझकर लटकाते हैं, तो उसे शिक्षक का उत्पीड़न माना जाएगा। अक्सर यह देखा जाता था कि प्रबंधन और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी के कारण शिक्षक असमंजस की स्थिति में रहते थे, लेकिन अब धारा 3(क) की याद दिलाकर शासन ने शिक्षकों की नौकरी को महफूज रखने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। यह कदम न केवल शिक्षकों के मनोबल को बढ़ाएगा, बल्कि विद्यालयों के शैक्षणिक वातावरण को भी प्रबंधन की राजनीति से दूर रखने में सहायक सिद्ध होगा।

