Type Here to Get Search Results !

मतदान को 'अनिवार्य' बनाना समय की मांग - सुप्रीम कोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

मतदान की अनिवार्यता और 'नोटा' का प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट का नया दृष्टिकोण

​भारत में लोकतंत्र के उत्सव को और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विमर्श छेड़ा है। हालिया सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने न केवल मतदान को अनिवार्य बनाने की संभावनाओं पर चर्चा की, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए।

​क्या मतदान को 'अनिवार्य' बनाना समय की मांग है?

​मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की। अदालत का मानना है कि अब समय आ गया है जब हमें मतदान को सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित करना चाहिए। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह तंत्र बहुत सख्त नहीं होना चाहिए, लेकिन इतना प्रभावी जरूर हो कि नागरिक अपने वोट की कीमत समझें और मतदान केंद्र तक पहुंचें।

Supreme Court bench hearing on mandatory voting and NOTA in India.

​पीठ ने विशेष रूप से दो सामाजिक पहलुओं को रेखांकित किया:

    • ग्रामीण उत्साह बनाम शहरी उदासीनता: ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान एक 'जश्न' की तरह मनाया जाता है, जहाँ महिलाएँ और आम लोग उत्साह के साथ भाग लेते हैं।
    • अमीर वर्ग की कम भागीदारी: न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि अक्सर शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग, कमजोर वर्ग की तुलना में मतदान के प्रति कम रुचि दिखाता है।

​निर्विरोध चुनाव और नोटा (NOTA) की चुनौती

​अदालत में दाखिल जनहित याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 53(2) को चुनौती दी गई है। वर्तमान में, यदि किसी सीट पर केवल एक ही उम्मीदवार हो, तो उसे निर्विरोध चुन लिया जाता है।

​याचिकाकर्ताओं (विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और शिव खेड़ा) का तर्क है कि:

  1. ​भले ही उम्मीदवार एक हो, चुनाव कराया जाना चाहिए ताकि मतदाताओं को नोटा का विकल्प मिल सके।
  2. ​यदि 'नोटा' को प्रभावी परिणाम (जैसे दोबारा चुनाव) से जोड़ा जाए, तो अधिक लोग वोट देने के लिए प्रेरित होंगे।
  3. ​वर्तमान में नोटा का कोई ठोस परिणाम न होने के कारण मतदाता इसे चुनने में दिलचस्पी नहीं लेते।

​अन्य प्रमुख कानूनी घटनाक्रम

​इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अन्य संवेदनशील मुद्दों पर भी अपनी राय रखी:

    • शब्बीर शाह मामला: अलगाववादी नेता शब्बीर शाह की जमानत पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने एनआईए (NIA) द्वारा पेश किए गए 30-35 साल पुराने भाषणों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए।
    • न्यायपालिका की स्वतंत्रता: संसदीय सूत्रों के हवाले से यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी न्यायाधीश को उनके द्वारा दिए गए 'न्यायिक फैसले' के आधार पर संसद द्वारा पद से नहीं हटाया जा सकता, जो न्यायपालिका की निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियाँ संकेत देती हैं कि भविष्य में भारतीय चुनाव प्रणाली में बड़े सुधार देखने को मिल सकते हैं, जहाँ 'नोटा' केवल एक प्रतीकात्मक बटन न रहकर उम्मीदवारों की गुणवत्ता सुधारने का एक सशक्त जरिया बन सकता है।

Top Post Ad

Bottom Post Ad