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सुप्रीम कोर्ट की फटकार: मुफ्त उपहार नहीं, रोजगार के रास्ते निकालें सरकारें

Sir Ji Ki Pathshala

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से ठीक पहले राज्य सरकारों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए की जाने वाली लोकलुभावन घोषणाओं (फ्रीबीज) पर कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकारें नकदी बांटने के बजाय रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करें ताकि नागरिक गरिमा के साथ अपना जीवन यापन कर सकें।

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supreme court on freebies vs employment news

​जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस प्रवृत्ति को देश के आर्थिक विकास के लिए एक बड़ी रुकावट बताया। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस चलन पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह राज्यों की वित्तीय सेहत को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

​कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:

  • आत्म-सम्मान बनाम मुफ्त पैसा: मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोगों को मुफ्त उपहार या सीधे बैंक खाते में नकदी देने के बजाय उन्हें काम करने के अवसर दिए जाने चाहिए। इससे न केवल उनकी आय बढ़ेगी बल्कि उनका आत्म-सम्मान भी बना रहेगा।
  • कार्य संस्कृति पर संकट: पीठ ने सवाल उठाया कि "अगर लोगों को घर बैठे मुफ्त पैसा मिलेगा, तो वे काम क्यों करेंगे?" कोर्ट ने चिंता जताई कि हम कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं।
  • राजस्व का सही उपयोग: कोर्ट ने सुझाव दिया कि राज्यों को अपना राजस्व सड़क, बिजली, सिंचाई, स्कूल और अस्पतालों जैसे बुनियादी ढांचे के विकास पर खर्च करना चाहिए।
"मुख्य चिंता यह है कि कई राज्य घाटे में होने के बावजूद मुफ्त उपहार बांट रहे हैं। सरकारों को चुनावी वादों के बजाय दीर्घकालिक विकास योजनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।" — सुप्रीम कोर्ट

​किसी एक राज्य का मामला नहीं

तमिलनाडु में बिजली बिल माफी जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने साफ किया कि यह टिप्पणी केवल किसी एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की सरकारों के लिए है। अदालत ने कल्याणकारी योजनाओं और केवल वोटों के लिए किए गए 'मुफ्त वादों' के बीच अंतर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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