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'आई' और 'ई' के फेर में 46 साल फंसी रही पेंशन, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नगर आयुक्त को लगाई फटकार।

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज: न्याय में देरी कभी-कभी मानवीय सहनशक्ति की परीक्षा बन जाती है। उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर निगम की एक छोटी सी लिपिकीय त्रुटि ने एक परिवार को लगभग आधी सदी तक दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया। महज़ एक अक्षर की स्पेलिंग में अंतर के कारण एक मृतक कर्मचारी के परिवार को पारिवारिक पेंशन पाने के लिए 46 साल तक अदालतों और दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े।

​क्या था पूरा मामला?

​यह मामला कानपुर नगर निगम के पूर्व कर्मचारी शिखर नाथ शुक्ला से जुड़ा है। उनकी सेवा के दौरान विभाग के रिकॉर्ड में उनके नाम की स्पेलिंग 'SHIKHAR' (आई के साथ) दर्ज थी। वहीं, उनके परिवार द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्रों और कुछ अन्य दस्तावेजों में नाम की स्पेलिंग 'SHEKHAR' (ई के साथ) लिखी गई थी।

  • रिटायरमेंट और मृत्यु: शिखर नाथ शुक्ला वर्ष 1975 में सेवानिवृत्त हुए और 1980 में उनका निधन हो गया।
  • विवाद की जड़: उनकी मृत्यु के बाद जब परिवार ने पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया, तो विभाग ने 'I' और 'E' के इस मामूली अंतर को आधार बनाकर फाइल रोक दी।

​कोर्ट की फटकार और कड़ा आदेश

​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने नगर निगम के अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि जब परिवार ने हलफनामा और उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जैसे ठोस दस्तावेज जमा कर दिए थे, तब भी महज़ एक अक्षर के अंतर पर इतने दशकों तक पेंशन रोकना संवेदनहीनता है।

"जब पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज मौजूद थे, तो केवल एक अक्षर के अंतर के आधार पर पेंशन को 45-46 वर्षों तक कैसे रोका जा सकता है?" - हाईकोर्ट

​वर्तमान स्थिति

​अदालत ने कानपुर नगर निगम के नगर आयुक्त को सख्त आदेश दिया है कि:

  1. एक सप्ताह के भीतर पारिवारिक पेंशन का पूर्ण भुगतान किया जाए।
  2. ​यदि आदेश का पालन नहीं होता है, तो नगर आयुक्त को 26 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होना होगा।

​यह मामला सरकारी तंत्र की सुस्ती और संवेदनहीनता का एक ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ न्याय पाने में एक पूरी पीढ़ी गुजर गई।

Allahabad High Court order on family pension delay case Kanpur

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