नई दिल्ली। शिक्षा के अधिकार कानून (RTE Act) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और सामाजिक समानता को मजबूत करने वाली टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि RTE का वास्तविक उद्देश्य यही है कि जज, अफसर, अमीर वर्ग और स्ट्रीट वेंडर जैसे गरीब तबके के बच्चे एक ही कक्षा में, एक ही बेंच पर साथ-साथ पढ़ें। इससे समाज में समानता, भाईचारा और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती मिलती है।
RTE को राष्ट्रीय मिशन की तरह देखा जाना चाहिए: SC
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम को केवल कानूनी प्रावधान न मानकर एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में लागू किया जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, RTE समाज में वर्ग भेद को कम करने और बच्चों को समान अवसर देने का सबसे सशक्त माध्यम है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता और संवैधानिक मूल्यों को भी विकसित करती है।
अनुच्छेद 12 और 21A के उद्देश्य पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि RTE अधिनियम का उद्देश्य अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) और अनुच्छेद 12 (समानता) की भावना को जमीनी स्तर पर लागू करना है। जब अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं, तो उनमें fraternity (भाईचारा) और आपसी समझ विकसित होती है।
25% आरक्षण का उद्देश्य क्या है?
कोर्ट ने याद दिलाया कि RTE कानून के तहत निजी गैर-अनुदानित स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित वर्ग के बच्चों को कक्षा 1 में 25% सीटों पर मुफ्त प्रवेश दिया जाता है।
इस प्रावधान का उद्देश्य सिर्फ शिक्षा देना नहीं, बल्कि सामाजिक दूरी को खत्म करना है।
बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को दी गई चुनौती
यह टिप्पणी उस मामले में आई है, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के 20 दिसंबर 2016 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि उनके बच्चों को RTE के तहत निजी स्कूलों में 25% मुफ्त सीटों पर प्रवेश दिया जाए।
इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“यदि किसी करोड़पति या जज का बच्चा उसी कक्षा और उसी बेंच पर बैठे, जिस पर एक ऑटो चालक या सब्जी विक्रेता का बच्चा बैठता है, तभी RTE का असली उद्देश्य पूरा होगा।”


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