नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि एक बार जब किसी न्यायाधीश द्वारा आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए जाते हैं, तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता, चाहे उसमें कोई गंभीर या असामान्य गलती ही क्यों न हो। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय केवल मामूली टाइपिंग, गणितीय या क्लेरिकल त्रुटियों में ही सुधार कर सकता है, न कि पूरे आदेश को पलट सकता है।
यह टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने एक नारकोटिक्स (NDPS) मामले में आरोपी को दी गई जमानत को पुनः बहाल कर दिया, जिसे पहले पटना हाई कोर्ट द्वारा वापस ले लिया गया था।
क्या था मामला
पटना हाई कोर्ट में नशीले पदार्थों से जुड़े एक केस में आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई थी। आदेश तैयार करते समय कोर्ट स्टाफ से गंभीर त्रुटि हो गई और “Rejected” (खारिज) की जगह “Allowed” (स्वीकृत) लिख दिया गया। आदेश पर न्यायाधीश के हस्ताक्षर भी हो गए और जमानत आदेश जारी हो गया।
बाद में जब हाई कोर्ट को इस गलती की जानकारी हुई, तो उसने अपने ही पूर्व आदेश को रद्द करते हुए आरोपी की जमानत वापस ले ली।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की पीठ ने सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि—
“एक बार जब किसी आदेश पर जज के हस्ताक्षर हो जाते हैं, तो वह न्यायिक आदेश बन जाता है। ऐसे आदेश को बाद में वापस लेना या बदलना कानूनन संभव नहीं है।”
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- न्यायालय केवल क्लेरिकल, टाइपिंग या गणितीय त्रुटियों को ही सुधार सकता है
- आदेश के मूल स्वरूप या निष्कर्ष को बदला नहीं जा सकता
- न्यायिक निश्चितता और कानून की विश्वसनीयता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है
जमानत बहाल, हाई कोर्ट का आदेश पलटा
इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए आरोपी की जमानत बहाल कर दी। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा जमानत वापस लेना न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के विपरीत था।


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