बिलासपुर उच्च न्यायालय ने शिक्षकों की वरिष्ठता को लेकर एक बेहद अहम और दूरगामी निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल अंतरजिला स्थानांतरण के आधार पर किसी शिक्षक को जूनियर घोषित नहीं किया जा सकता, चाहे वह स्थानांतरण स्वेच्छा से ही क्यों न किया गया हो। यह फैसला छत्तीसगढ़ के हजारों शिक्षकों के लिए बड़ी राहत के रूप में सामने आया है।
वरिष्ठता का आधार: प्रारंभिक नियुक्ति तिथि
न्यायमूर्ति एके प्रसाद की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि सेवा से जुड़े सभी उद्देश्यों के लिए कर्मचारी की प्रारंभिक नियुक्ति तिथि ही वरिष्ठता का एकमात्र वैध आधार होगी। यदि कोई कर्मचारी एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरित होता है, तो मात्र ज्वाइनिंग की नई तारीख के आधार पर उसकी वर्षों पुरानी वरिष्ठता समाप्त नहीं की जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता शिक्षकों की नियुक्ति 10 दिसंबर 2010 को प्राथमिक शाला प्रधान पाठक के पद पर हुई थी। बाद में स्वास्थ्य एवं पारिवारिक कारणों से उन्होंने बलौदाबाजार-भाटापारा जिले से रायपुर जिले में स्थानांतरण के लिए आवेदन किया। दोनों जिले एक ही रायपुर संभाग के अंतर्गत आते हैं और एक ही लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) द्वारा नियंत्रित हैं।
इसके बावजूद, स्कूल शिक्षा विभाग ने मार्च 2021 में जारी संशोधित ग्रेडेशन सूची में इन शिक्षकों की वरिष्ठता स्थानांतरण के बाद की ज्वाइनिंग तिथि से गिननी शुरू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि वरिष्ठ शिक्षक अपने ही जूनियर्स से नीचे चले गए और प्रधान पाठक (मिडिल स्कूल) पद पर पदोन्नति से वंचित रह गए।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को मनमाना बताते हुए कहा कि नई पदस्थापना के आधार पर किसी वरिष्ठ कर्मचारी को नीचे रखना कानूनन गलत है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि ‘स्व-अनुरोध’ और ‘प्रशासनिक आधार’ पर किए गए स्थानांतरण के बीच वरिष्ठता के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश
अदालत ने राज्य शासन को आदेश दिया है कि:
- याचिकाकर्ता शिक्षकों की ग्रेडेशन सूची में तत्काल संशोधन किया जाए
- वरिष्ठता 10 दिसंबर 2010 (प्रारंभिक नियुक्ति तिथि) से मानी जाए
- नई ग्रेडेशन सूची के आधार पर पदोन्नति की प्रक्रिया कानून के अनुसार पूरी की जाए
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि याचिकाकर्ता शिक्षक अपनी वास्तविक वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति पाने के पूर्ण हकदार हैं।
शिक्षकों के अधिकारों की बड़ी जीत
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि विभाग द्वारा तैयार की गई सूची कुछ शिक्षकों को अनुचित लाभ देने के उद्देश्य से बनाई गई थी। हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं या स्थानांतरण की आड़ में कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों और अर्जित वरिष्ठता के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
यह निर्णय न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि देशभर के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक मजबूत कानूनी मिसाल बनकर उभरा है, जो स्थानांतरण के कारण अपनी वरिष्ठता और पदोन्नति को लेकर आशंकित रहते हैं।


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