नई दिल्ली। परिवारिक संपत्ति पर बेटियों के अधिकार को और मजबूती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने कहा कि यदि पिता या परिवार ने पहले से कोई समझौता किया हो, तो भी बेटी का कानूनी हिस्सा नहीं रोका जा सकता, खासकर तब जब वह उस समझौते का हिस्सा न रही हो।
🔍 मामला: Sanjay Gupta बनाम Sonakshi Gupta
- बेटी ने HUF (संयुक्त हिंदू परिवार) संपत्ति में अपना हिस्सा मांगा।
- पिता ने तर्क दिया कि परिवार ने 2006 में समझौता कर लिया था।
- बेटी का कहना था कि वह 2009 में बालिग हुई और 2005 संशोधन के तहत उसका अधिकार जन्मसिद्ध है।
⚖️ अदालत का स्पष्ट निष्कर्ष
1️⃣ बेटी समझौते से बाध्य नहीं
यदि वह नाबालिग थी या उस समझौते में शामिल नहीं थी — तो समझौता उसकी दावेदारी को नहीं रोकता।
2️⃣ बेटे-बेटी को बराबरी का कॉपार्सनरी अधिकार
2005 संशोधन के बाद बेटी HUF की जन्मसिद्ध सदस्य है—बेटे के समान अधिकारों के साथ।
3️⃣ पुराना पारिवारिक समझौता दावा खत्म नहीं कर सकता
यदि विवादित तथ्य हों या बेटी की सहमति शामिल न हो, तो दावा पूरी तरह वैध है।
📜 2005 के संशोधन ने क्या बदला?
- बेटी = जन्म से कॉपार्सनर
- HUF संपत्ति में पूर्ण और बराबर हिस्सा
- शादी के बाद भी अधिकार कायम
- पिता की संपत्ति में बेटों जैसे ही अधिकार
यह संशोधन बेटियों को संपत्ति में समान दर्जा देता है।
🎯 इस फैसले से आम परिवार क्या समझें?
- ✔ पिता या भाइयों का किया पुराना समझौता बेटी का हक नहीं छीन सकता।
- ✔ बेटी बालिग होने के बाद कभी भी अपना हिस्सा मांग सकती है।
- ✔ कॉपार्सनरी अधिकार केवल समझौते से खत्म नहीं किया जा सकता।
- ✔ अदालतें समानता के अधिकार को पहले से कहीं अधिक मजबूती दे रही हैं।
🟦 अंतिम संदेश
यह फैसला एक बार फिर साबित करता है कि—
“HUF संपत्ति में बेटी भी उतनी ही वारिस है जितना बेटा।”
“पुराने समझौते उसके अधिकार को समाप्त नहीं कर सकते।”
यह निर्णय समाज में बेटियों के अधिकारों को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करता है और समानता की राह को और मजबूत बनाता है।


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