सरकार का लक्ष्य डिजिटल पारदर्शिता, लेकिन शिक्षकों की चिंता—“हम पढ़ाएँ या ऐप चलाएँ?”
सुबह के नौ बजते ही परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की चहक, प्रार्थना की गूंज और “गुड मॉर्निंग सर” की आवाज़ें माहौल को जीवंत बना देती हैं। लेकिन इस उमंग भरे वातावरण के बीच शिक्षकों की निगाहें अब बच्चों की किताबों पर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर टिकी होती हैं। कोई प्रेरणा ऐप में लॉगिन करने की कोशिश में है, तो कोई निपुण लक्ष्य पर रिपोर्ट अपलोड करते-करते थक चुका है।
कमज़ोर नेटवर्क, अधूरी अपलोडिंग और लगातार आने वाले अपडेट्स ने शिक्षकों की दिनचर्या को जटिल बना दिया है। शिक्षकों का कहना है कि उनके मोबाइल में अब तक 40 से अधिक सरकारी ऐप इंस्टॉल हैं। इनमें निपुण लक्ष्य, प्रेरणा, दीक्षा, कर्मयोगी भारत, PFMS, ई-कवच, यू-डायस, शारदा, समर्थ, खेलो इंडिया, फिट इंडिया, निष्ठा, परख, ज्ञान समीक्षा, स्वच्छ विद्यालय, हरितिमा अमृत वन जैसे ऐप शामिल हैं — और हर एक पर अलग-अलग रिपोर्टिंग करनी होती है।
नई चुनौती: बिल्डथान प्रतियोगिता
वर्तमान में शिक्षकों के सामने ‘बिल्डथान प्रतियोगिता’ नई सिरदर्दी बनकर उभरी है। इसमें कक्षा 6 से 8 के छात्रों को 24 अंग्रेज़ी वीडियो दिखाने हैं। वीडियो देखने के बाद छात्रों को क्विज करानी होती है, फिर उनका इनोवेशन आइडिया लेकर मॉडल बनवाना और उसका वीडियो तैयार कर यूट्यूब पर अपलोड करना पड़ता है।
एक शिक्षक ने बताया, “छात्रों के पास मोबाइल नहीं हैं, इसलिए हमें अपने ही फोन से वीडियो दिखाने पड़ते हैं। शिक्षण का समय रिपोर्टिंग और अपलोडिंग में निकल जाता है।”
विभाग की मंशा और हकीकत में फासला
शिक्षा विभाग का दावा है कि डिजिटल माध्यमों से शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी, जवाबदेह और परिणाममूलक बनाया जा रहा है। लेकिन जमीनी स्तर पर शिक्षक इसे “डिजिटल बोझ” बता रहे हैं।
एक प्रधानाध्यापक ने कहा, “कभी प्रेरणा ऐप अपडेट हो जाता है, तो कभी निपुण लक्ष्य का सर्वर डाउन रहता है। अब तो दीक्षा ऐप के दो वर्जन और नया टीचर ऐप भी आ गया है। एकीकृत प्लेटफॉर्म की सख्त ज़रूरत है।”
शिक्षकों की मांग: एक ऐप, एक समाधान
शिक्षकों का कहना है कि रिपोर्टिंग के लिए एकीकृत प्लेटफॉर्म बनाया जाए ताकि समय बच सके और शिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। “डिजिटल साधन सहायक होने चाहिए, बाधा नहीं,” एक शिक्षक ने कहा।
डिजिटल सुधार की दिशा में उठाए गए कदमों का उद्देश्य भले ही अच्छा हो, लेकिन जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था उलझन पैदा कर रही है। जब तक शिक्षकों को तकनीक की बजाय शिक्षण पर ध्यान देने का समय नहीं मिलेगा, तब तक न तो “निपुण भारत” का लक्ष्य पूरा होगा और न ही बच्चों की सीखने की गति तेज़ होगी।

