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मातृत्व अवकाश के लिए पहली और दूसरी संतान के बीच 2 साल का अंतर जरूरी नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

Sir Ji Ki Pathshala

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मातृत्व अवकाश को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पहली और दूसरी संतान के जन्म के बीच दो वर्ष का अंतर होना अनिवार्य नहीं है। केवल इस आधार पर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

कानपुर नगर की स्टाफ नर्स शिखा यादव और एक अन्य महिला कर्मचारी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने उनकी मातृत्व अवकाश की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उत्तर प्रदेश वित्तीय हैंडबुक के नियम 153(1) और 8 दिसंबर 2008 के शासनादेश के अनुसार पहले मातृत्व अवकाश के दो वर्ष के भीतर दूसरा मातृत्व अवकाश नहीं दिया जा सकता।

मातृत्व अवकाश पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 2 साल का अंतर जरूरी नहीं

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने विभाग के 6 और 9 जनवरी के आदेशों को निरस्त करते हुए कहा कि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधान सर्वोपरि हैं। यदि किसी राज्य के नियम या कार्यपालिका के आदेश संसद द्वारा बनाए गए कानून से असंगत हैं, तो संसद के कानून के प्रावधान लागू होंगे।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 161 में पहली और दूसरी संतान के जन्म के बीच किसी न्यूनतम समय अंतराल की शर्त का उल्लेख नहीं है। इसलिए केवल दो वर्ष का अंतर न होने के आधार पर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि दोनों याचिकाकर्ताओं की मातृत्व अवकाश संबंधी अर्जी पर दो सप्ताह के भीतर कानून के अनुरूप पुनः निर्णय लिया जाए।

यह फैसला महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ महिलाओं का वैधानिक अधिकार है और इसे पुराने प्रशासनिक नियमों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता, यदि वे संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रावधानों से मेल नहीं खाते।